भोजशाला विवाद: सरस्वती मंदिर तोड़े जाने का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं, यह केवल काल्पनिक कथा- मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट से कहा

Update: 2026-04-30 07:47 GMT

भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद में मुस्लिम पक्ष ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को बताया कि भोजशाला परिसर में सरस्वती मंदिर तोड़े जाने का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है और इस संबंध में प्रस्तुत दावा केवल काल्पनिक परिकल्पना है।

मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष यह दलील दी।

विवाद 11वीं शताब्दी के संरक्षित स्मारक भोजशाला से संबंधित है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित किया गया। हिंदू पक्ष इस स्थल को देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।

वर्ष 2003 की व्यवस्था के अनुसार मंगलवार को हिंदू पक्ष यहां पूजा करता है और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करता है।

मामले में दायर जनहित याचिका में परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने स्थल को हिंदू समुदाय को सौंपने तथा मुस्लिम पक्ष को नमाज से रोकने की मांग की गई। इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने सर्वे का आदेश दिया था, जिसे मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे की अनुमति देते हुए रिपोर्ट सभी पक्षों को उपलब्ध कराने और अंतिम सुनवाई में आपत्तियां सुनने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वकील तौसीफ वारसी ने कहा कि याचिकाओं में लंदन स्थित कथित सरस्वती प्रतिमा की वापसी की मांग भी की गई, जबकि ब्रिटिश उच्चायोग और ब्रिटिश म्यूजियम के पत्राचार से स्पष्ट है कि संबंधित प्रतिमा सरस्वती की नहीं बल्कि जैन देवी की है।

उन्होंने अदालत को बताया कि रिकॉर्ड में उल्लेख है कि प्रतिमा के साथ सिंह और एक बालक दर्शाए गए, जिससे स्पष्ट है कि वह जैन देवी की मूर्ति है न कि सरस्वती की।

मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि खिलजी काल के मालवा संबंधी विस्तृत ऐतिहासिक अभिलेखों में अनेक सैन्य अभियानों और प्रशासनिक घटनाओं का उल्लेख है, परंतु कहीं भी धार स्थित किसी सरस्वती मंदिर के विध्वंस का जिक्र नहीं मिलता।

वकील ने कहा कि परिसर में किसी पूजा स्थल की उपस्थिति मात्र से पूरे ढांचे का स्वरूप तय नहीं किया जा सकता।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “यदि किसी अस्पताल या पुलिस थाने में मंदिर हो तो इससे पूरा अस्पताल या थाना मंदिर नहीं बन जाता।”

पिछली सुनवाई में हस्तक्षेपकर्ताओं ने यह भी दलील दी थी कि स्वामित्व और शीर्षक का विवाद जनहित याचिका के माध्यम से तय नहीं किया जा सकता।

मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।

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