मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन की मंजूरी (Prosecution Sanction) देने के लिए अधिकृत अधिकारी को इस सवाल पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए। वह किसी लोक सेवक के खिलाफ विशेष न्यायाधीश (Special Judge) के शुरुआती निष्कर्षों (Prima Facie findings) से प्रभावित नहीं हो सकता। [2026 LiveLaw (MP) 416]

भ्रष्टाचार के आरोपी लोक सेवक के खिलाफ 'फाइनल क्लोजर रिपोर्ट' (मामला बंद करने की रिपोर्ट) खारिज करने वाला स्पेशल जज का आदेश रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने कहा:

"अगर कोई स्पेशल जज यह निष्कर्ष निकालता है कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आरोप बनता है, तो मंजूरी देने वाले अधिकारी को लग सकता है कि उसके पास मंजूरी देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इससे लोक सेवकों को कानून के तहत मिले संरक्षण का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। मंजूरी देने वाले अधिकारी को विशेष न्यायाधीश के आदेश से प्रभावित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से अपना फैसला लेना चाहिए।"

मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता, जो अब रिटायर हो चुके हैं, पहले 'ब्रिज कॉर्पोरेशन' में उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के रूप में कार्यरत थे। बाद में इसके लोक निर्माण विभाग (PWD) में विलय के बाद उन्हें इंदौर में कार्यकारी अभियंता (Executive Engineer) के पद पर तैनात किया गया।

शिकायतकर्ता 'क्लास A' सरकारी ठेकेदार है। उसने दावा किया कि उसे खान नदी पर एक पुल (Submersible Bridge) बनाने का टेंडर मिला। इसके बाद PWD और शिकायतकर्ता के बीच एक समझौता हुआ। जब काम लगभग 80% पूरा हो गया, तो उसे अपने बैंक खाते में लगभग 1.50 करोड़ रुपये का भुगतान (Running Payments) प्राप्त हुआ।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 मई 2017 को याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को अपने कार्यालय बुलाया, उसे बताया कि उसके बिल पास हो गए हैं, और कमीशन के तौर पर 6.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी। शिकायतकर्ता का दावा है कि उसने याचिकाकर्ता को 1.5 लाख रुपये नकद दिए। उसने बताया कि वह बाकी की रिश्वत की रकम नहीं देना चाहता, इसलिए 4 जुलाई 2017 को उसने इंदौर के पुलिस अधीक्षक (SP) को एक लिखित शिकायत दी। उसे आवेदक के साथ अपनी बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए एक डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर दिया गया। उस शाम आवेदक के कार्यालय में हुई मुलाकात के दौरान, आवेदक ने कथित तौर पर बाकी के ₹5 लाख लेने पर सहमति जताई और शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह यह रकम SDO को सौंप दे।

अगले दिन, आवेदक ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता को फोन किया और पूछा कि SDO को पैसे क्यों नहीं दिए गए। उसने शिकायतकर्ता से पैसे लेकर अपने कार्यालय आने के लिए भी कहा। शिकायतकर्ता ने इस फोन बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया।

ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर पुलिस ने 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 के तहत FIR दर्ज की। हालाँकि, 13, 14 और 17 जुलाई 2017 को जाल बिछाने (ट्रैप करने) की कोशिशें नाकाम रहीं, क्योंकि आवेदक मौजूद नहीं था और उसका फोन बंद था।

जांच के बाद पुलिस ने 15 फरवरी 2019 को एक 'क्लोजर रिपोर्ट' (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल की। ​​इसमें कहा गया कि यह मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं कि रिश्वत मांगी गई, खासकर इसलिए क्योंकि 'रनिंग बिल' (चल रहे बिलों) का भुगतान पहले ही किया जा चुका था और जाल बिछाने की कोशिश भी विफल रही थी।

हालांकि, स्पेशल जज ने 1 मई 2025 के अपने आदेश से इस क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया। उन्होंने माना कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' की धारा 7 के तहत मामला बनता है। जज ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर रिकॉर्ड को सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के पास भेजें, ताकि मुकदमा चलाने की मंजूरी (Prosecution Sanction) ली जा सके।

इससे असंतुष्ट होकर आवेदक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने तर्क दिया कि स्पेशल जज के पास जांच एजेंसी को मुकदमा चलाने की मंजूरी लेने का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं है। यह भी दलील दी गई कि विशेष न्यायाधीश को क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर लेनी चाहिए।

आवेदक के वकील ने दावा किया कि मुकदमा चलाने की मंजूरी देने वाले प्राधिकारी को स्वतंत्र रूप से और अदालत के किसी भी दबाव के बिना यह फैसला लेना होता है कि मंजूरी दी जाए या नहीं।

राज्य के वकील ने तर्क दिया कि स्पेशल जज ने केवल पुलिस रिपोर्ट को खारिज करने की अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया, क्योंकि क्लोजर रिपोर्ट पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण थी। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि जांच अधिकारी ने गलत निष्कर्ष निकाला कि 'रनिंग बिल' का भुगतान हो जाने से रिश्वत मांगने का मकसद खत्म हो जाता है।

इसके अलावा, वकील ने कहा कि धारा 7 पीसीए के तहत रिश्वत की मांग करना पूरी तरह से अपराध है और इसलिए आरोपी को जाल में रंगे हाथों पकड़ने में विफलता अपराध को खत्म नहीं करती है।

अदालत ने मीनू कुमारी बनाम बिहार राज्य [2006 4 एससीसी 359] के मामले का जिक्र करते हुए दोहराया कि मजिस्ट्रेट रिपोर्ट को स्वीकार कर सकता है, आगे की जांच का निर्देश दे सकता है, या केस डायरी के आधार पर पुलिस रिपोर्ट से असहमत हो सकता है।

वर्तमान मामले में अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी के अनुसार, मांग स्थापित नहीं हुई थी क्योंकि भौतिक जाल विफल हो गया था। हालाँकि, रिकॉर्ड में फोरेंसिक वॉयस विश्लेषण रिपोर्ट थी।

इस प्रकार, पीठ ने कहा,

"इसलिए क्लोजर रिपोर्ट से असहमत होना और यह निर्देश देना कि मामले को मंजूरी के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखा जाए, स्पेशल जज के अधिकार क्षेत्र में है।"

मंजूरी प्राधिकारी को प्रभावित करने वाले स्पेशल जज के आदेश के संबंध में अदालत ने कहा कि पीसीए की धारा 19 के तहत मंजूरी देना एक "गंभीर प्रशासनिक कर्तव्य" है। सक्षम प्राधिकारी को पूरी जांच रिपोर्ट पढ़नी थी और अपना स्वतंत्र विवेक लगाना था।

अरुण कुमार अग्रवाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य [2014 12 एससीसी 707] के मामले का जिक्र करते हुए खंडपीठ ने स्पेशल जज की टिप्पणी से सहमति व्यक्त की कि आवेदक के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप बनता है। इस प्रकार, अदालत ने कहा कि हालांकि क्लोजर रिपोर्ट की अस्वीकृति सही थी, प्रथम दृष्टया आरोप की विशिष्ट टिप्पणी को पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि यह अंतिम न्यायिक आदेश की तरह लगता है।

इस प्रकार, पीठ ने कहा:

"उपरोक्त चर्चा किए गए तथ्यों और कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस याचिका को आंशिक रूप से नीचे बताई गई सीमा तक अनुमति दी जाती है। एमजेसीआर संख्या 826/2019 में स्पेशल जज, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, इंदौर द्वारा पारित आदेश दिनांक 01.05.2025 को अब तक बरकरार रखा गया, क्योंकि यह अंतिम क्लोजर रिपोर्ट संख्या 02/2019 को खारिज कर देता है और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रिकॉर्ड रखने का निर्देश देता है। हालांकि, विवादित आदेश को संशोधित किया गया। इस हद तक कि स्पेशल जज की टिप्पणी में कहा गया कि "इस बुनियादी ढांचे के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई अधिनियम 1998 की धारा 7 के दायरे में दंडनीय अपराध होता है" को पूरी तरह से एक ओबिटर तानाशाही के रूप में माना जाएगा।

Case Title : Ramnath Mishra v Special Police Establishment

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