क्या बिना पूर्व Environmental Clearance के उद्योगों को बंद किया जाना चाहिए? एक कानूनी विश्लेषण

Update: 2025-03-20 11:34 GMT
क्या बिना पूर्व Environmental Clearance के उद्योगों को बंद किया जाना चाहिए? एक कानूनी विश्लेषण

भारत में पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance - EC) और औद्योगिक संचालन को लेकर कई महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने M/S Pahwa Plastics Pvt. Ltd. & Anr. बनाम Dastak NGO & Ors. (2022) के मामले में यह तय किया कि क्या किसी ऐसे उद्योग को बंद किया जाना चाहिए, जिसे पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं मिली है, लेकिन जिसे कानूनी रूप से Consent to Establish (CTE) और Consent to Operate (CTO) प्राप्त हुआ है और जिसने Post-Facto EC (बाद में दी जाने वाली स्वीकृति) के लिए आवेदन किया है।

इस फैसले में सस्टेनेबल डेवलपमेंट (Sustainable Development), एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle), और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) जैसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सिद्धांतों पर चर्चा की गई। साथ ही, औद्योगिक विकास और रोज़गार के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को भी समझाया गया।

पर्यावरण सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचा (Legal Framework for Environmental Protection)

पर्यावरण संरक्षण के लिए भारत में कई कानून बनाए गए हैं। ये मुख्य रूप से 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन (Stockholm Conference) के बाद अस्तित्व में आए। इनमें प्रमुख हैं:

1. जल (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974) – जल प्रदूषण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए।

2. वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981) – वायु प्रदूषण को कम करने के लिए।

3. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment (Protection) Act, 1986 - EP Act) – केंद्र सरकार को पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार देता है।

पर्यावरण प्रभाव आंकलन (Environmental Impact Assessment - EIA) अधिसूचना, 2006 के तहत, कुछ उद्योगों को काम शुरू करने से पहले पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति (Prior Environmental Clearance) लेना अनिवार्य किया गया है। हालांकि, 2017 में सरकार ने एक नई अधिसूचना जारी कर Post-Facto EC (बाद में दी जाने वाली स्वीकृति) की अनुमति दी, यदि उद्योग पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रहे हों।

पूर्व-तथ्य पर्यावरणीय स्वीकृति पर न्यायिक व्याख्या (Judicial Interpretation of Ex-Post Facto Environmental Clearance)

सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार किया कि क्या बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति (Prior EC) के उद्योगों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए या उन्हें Post-Facto EC प्राप्त करने तक काम करने दिया जाना चाहिए।

Alembic Pharmaceuticals Ltd. बनाम Rohit Prajapati (2020)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Post-Facto EC पर्यावरण कानूनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे सामान्य प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय प्रभावों का आंकलन (Environmental Impact Assessment) परियोजना शुरू होने से पहले किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उद्योग पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

हालांकि, Pahwa Plastics मामले में कोर्ट ने Alembic Pharmaceuticals से अलग दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई उद्योग पर्यावरण मानकों का पालन कर रहा है, तो केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि (Procedural Lapse) के कारण उसे बंद करना अनुचित होगा।

Electrosteel Steels Ltd. बनाम Union of India (2021)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पूर्व EC आवश्यक है, लेकिन जिन उद्योगों को राज्य सरकार की स्वीकृति मिली है और जो ईमानदारी से काम कर रहे हैं, उन्हें अचानक बंद नहीं किया जाना चाहिए।

Pahwa Plastics मामले में भी कोर्ट ने यही दृष्टिकोण अपनाया और कहा कि यदि कोई उद्योग पर्यावरणीय नियमों का पालन कर रहा है, तो उसे केवल इस आधार पर बंद नहीं किया जाना चाहिए कि उसने पूर्व EC नहीं ली थी।

पर्यावरण कानूनों में समानुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality in Environmental Law)

सुप्रीम कोर्ट ने Lafarge Umiam Mining Pvt. Ltd. बनाम Union of India (2011) के मामले में समानुपातिकता सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) को पर्यावरण मामलों में लागू करने की बात कही थी। इस सिद्धांत के अनुसार, पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

Pahwa Plastics मामले में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई उद्योग पर्यावरण मानकों का पालन कर रहा है, तो उसे तुरंत बंद करने की बजाय दंडात्मक उपाय (Penal Measures) अपनाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) के तहत उद्योगों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, जिससे पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई की जा सके।

औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन (Balancing Industrial Growth and Environmental Protection)

सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि औद्योगीकरण और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चलने चाहिए। यदि किसी उद्योग ने गलती से पूर्व EC नहीं ली है, लेकिन वह पर्यावरण मानकों का पालन कर रहा है, तो उसे बंद करने की बजाय सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए।

अर्थव्यवस्था और रोज़गार का महत्व (Economic and Employment Considerations)

• यह मामला ऐसे उद्योगों से संबंधित था जो 8,000 से अधिक कर्मचारियों को रोजगार देते थे और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते थे।

• अचानक बंद होने से बेरोज़गारी बढ़ेगी और आर्थिक संकट उत्पन्न होगा।

नियामक निकायों की भूमिका (Regulatory Oversight and Good Faith Compliance)

• इन उद्योगों को हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) से CTE और CTO प्राप्त था।

• HSPCB स्वयं यह तय नहीं कर पाया कि इन उद्योगों को पूर्व EC की आवश्यकता थी या नहीं।

पर्यावरणीय अनुपालन (Environmental Compliance Measures)

• इन उद्योगों की Zero Trade Discharge नीति थी, जिससे कोई बाहरी प्रदूषण नहीं हो रहा था।

• जनसुनवाई (Public Hearing) पहले ही हो चुकी थी और उद्योग अंतिम चरण में EC प्राप्त करने की प्रक्रिया में थे।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय (Supreme Court's Final Ruling)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण उद्योगों को बंद करना अनुचित होगा, विशेष रूप से जब वे पर्यावरण मानकों का पालन कर रहे हों।

न्यायालय ने निम्नलिखित निष्कर्ष दिए:

• Post-Facto EC आमतौर पर नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन विशेष परिस्थितियों में अनुमति दी जा सकती है।

• जो उद्योग नियामक प्राधिकरणों की मंजूरी से कार्य कर रहे हैं और पर्यावरण नियमों का पालन कर रहे हैं, उन्हें अचानक बंद नहीं किया जाना चाहिए।

• भविष्य में ऐसी समस्याओं से बचने के लिए नियामक एजेंसियों को पर्यावरणीय कानूनों को स्पष्ट करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट होता है कि पर्यावरणीय नियमों का पालन अनिवार्य है, लेकिन औद्योगिक इकाइयों को केवल प्रक्रियात्मक त्रुटियों के कारण बंद नहीं किया जाना चाहिए। यह निर्णय दर्शाता है कि स्थायी विकास (Sustainable Development) के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें पर्यावरण सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों का ध्यान रखा जाए।

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