जानिए आजीवन कारावास का अर्थ और दंड के प्रकार

Update: 2020-01-31 03:15 GMT

किसी भी आपराधिक विधि में शास्ति के रूप में दंड का प्रावधान रखा गया है, जिससे व्यक्ति इस तरह का अपराध करने से भयभीत रहे तथा समाज में शांति रहे और अपराध मुक्त समाज का निर्माण हो सके।

भारत के दंड विधान में भी दंड का उल्लेख किया गया है, भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में दंड के प्रकार बताए गए हैं तथा इसी दंड के प्रकारों में आजीवन कारावास का भी उल्लेख किया गया है। इस लेख के माध्यम से भारत में प्रचलित दंड एवं विशेष रूप से आजीवन कारावास को समझने का प्रयास किया जा रहा है।

किसी समय समाज में बहुत तरह के दंड प्रचलित थे, परंतु समय और सभ्यताओं के साथ दंड को बहुत सीमित कर दिया गया है।

आजीवन कारावास याने उम्रकैद (life imprisonment) की सज़ा गंभीर अपराधों के लिए दी जाती है। भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 में अपराधों के दंड के विषय में विस्तार से बताया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में बताया गया है कि दंड कितने प्रकार के होते हैं।

1. मृत्यु

यह पहली तरह का दंड है, जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में दिया गया है। यह मृत्युदंड है, इस दंड में व्यक्ति को राज्य द्वारा मृत्यु दी जाती है। किसी समय इस तरह की मृत्यु भिन्न भिन्न प्रकार से दी जाती थी परंतु अब अपराधियों को केवल फांसी के माध्यम से मृत्यु दी जाती है तथा यह फांसी भी जन समुदाय के सामने नहीं होती है, बल्कि गुप्त रूप से दी जाती है।

सार्वजनिक रूप से फांसी दिए जाने पर भारत में रोक लगाई गई है तथा केवल राज्य द्वारा गुप्त रूप से मृत्युदंड के दोषी को फांसी दी जाएगी।

2. आजीवन कारावास

दंड के इस प्रकार को इस लेख में विस्तृत रूप से आगे समझा जाएगा।

 निर्वासन

निर्वासन दंड के रूप में दिया जाता था लेकिन दंड के इस प्रकार को रद्द कर दिया गया है।

3. कारावास

भारतीय दंड संहिता में अपराधों के संदर्भ में दिया जाने वाला करावास दो तरह का कारावास हो सकता है।

कठिन और कठोर कारावास के साथ श्रम।

सादा कारावास।

4. संपत्ति का संपहरण

5. जुर्माना

जुर्माना बहुत तरह के अपराधों में दिया जाता है।

आजीवन कारावास

समाज में आजीवन कारावास को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं तथा आजीवन कारावास को लेकर बहुत ही अलग अलग बातें कहने और सुनने को मिलती हैं। इस पर स्पष्ट बात होनी चाहिए। आजीवन कारावास का क्या अर्थ है?

कुछ लोग आजीवन कारावास को 20 वर्ष का कारावास मानते हैं। कुछ लोग आजीवन कारावास को 14 वर्ष का कारावास मानते हैं। कुछ लोग रात और दिन को अलग-अलग कारावास मानते हैं।

जब कोई अदालत किसी अपराध के लिए किसी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है तो विधि के समक्ष इस सज़ा की अवधि का अर्थ सज़ा पाने वाले व्यक्ति की अंतिम सांस तक होता है। अर्थात वह व्यक्ति अपने शेष जीवन के लिए जेल में रहेगा। यही आजीवन कारावास का अर्थ है जिसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसलों में की है।

आजीवन कारावास 20 वर्ष का कारावास नहीं होता

आजीवन कारावास को 20 वर्ष का कारावास समझे जाने के संदर्भ में समाज में एक बड़ी भ्रांति है, जबकि आजीवन कारावास 20 वर्ष का कारावास नहीं होता है। यह शेष बचे जीवन का कारावास होता है।

मोहम्मद मुन्ना बना यूनियन ऑफ इंडिया (एआईआर 2005 एस सी 3440) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित किया गया है कि आजीवन कारावास से अभिप्राय कठोर आजीवन (जीवनपर्यंत) कारावास से है। यह 14 या 20 वर्ष के कारावास के तुल्य नहीं है। आजीवन कारावास से दंडित अपराधी को कारागृह में रखा जा सकता है।

एक मामला खोका उर्फ प्रशांत सेन बनाम बीके श्रीवास्तव का भी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि आजीवन कारावास से अभिप्राय 20 वर्ष की अवधि के कारावास से ना होकर दोषसिद्ध व्यक्ति के संपूर्ण जीवनपर्यंत कारावास से है।

आजीवन कारावास के दंड का लघुकरण

भारतीय दंड संहिता आजीवन कारावास के दंड के लघुकरण के संदर्भ में बताती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 55 में आजीवन कारावास के लघुकरण का प्रावधान रखा गया है। इस प्रावधान से भ्रांतियां का जन्म होता है।

कोई भी समुचित सरकार किसी भी मामले में जिस में आजीवन कारावास का दंड आदेश दिया गया हो किसी अपराधी की सम्मति के बिना भी आजीवन कारावास को कम कर सकती है। यदि आजीवन कारावास कम किया जाता है तो इसे कम किए जाने की अवधि 14 वर्ष तक की होगी अर्थात किसी भी आजीवन कारावास को यदि समुचित सरकार द्वारा कम किया जा रहा है तो वह कारावास 14 साल से कम तक का हो सकता है। दोषी को चौदह साल के पहले छोड़ दिया जाएगा।

भारतीय दंड संहिता में केंद्र और राज्य को दी गई यह दो बड़ी शक्तियां है, जिसमें वह किसी भी आजीवन कारावास से दंडित अपराधी का कारावास कम कर सकती है। 14 वर्ष से कम की कितनी भी अवधि के लिए व्यक्ति को कारावास दे सकती है।

परंतु भारत दंड संहिता की धारा 433 (ए) के अंतर्गत एक अपवाद भी दिया गया है। जिस अपवाद के परिणाम स्वरूप यदि व्यक्ति को ऐसे अपराध के मामले में आजीवन कारावास दिया गया है, जिस अपराध में मृत्युदंड दिए जाने का प्रावधान था परंतु मृत्युदंड देने के स्थान पर दोषी को आजीवन कारावास दिया गया है तो ऐसी परिस्थिति में समुचित सरकार आजीवन कारावास को कम करती है तो कम करने की अवधि कम से कम 14 वर्ष की होगी। 14 वर्ष से कम अवधि को नहीं किया जा सकता है।

इस नियम के कारण भ्रांतिया फैलती है कि आजीवन कारावास 14 वर्ष का होता है परंतु यह कारावास आजीवन कारावास नहीं है यह तो समुचित सरकार द्वारा कम किया गया कारावास है।

सिद्धार्थ वशिष्ठ @ मनु शर्मा बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली के मामले में जेसिका लाल नामक महिला की हत्या के दोषी मनु शर्मा ने अपनी याचिका उच्चतम न्यायालय में इस आधार पर दाखिल की थी कि वह चौदह वर्ष का कारावास काट लेने के बाद आजीवन कारावास से रिहाई का अधिकार रखता है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि रिहाई का आदेश समुचित सरकार दे सकती है और इसके संबंध में उच्चतम न्यायालय कोई दिशानिर्देश नहीं जारी कर सकता।

इस मामले में पहले सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा दोषी को चौदह साल के कारावास के पूरे हो जाने के बाद छोड़ दिए जाने से समुचित सरकार ने इंकार कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने इसे समुचित सरकार का अधिकार माना है। दोषी को रिहा करना न करना दोषी के आचरण पर निर्भर करता है। यह आचरण कैसा होगा इसे तय करने का अधिकार सरकार द्वारा बनाई गयी सजा समीक्षा बोर्ड को होगा।

आजीवन कारावास की गणना

भारत दंड संहिता की धारा 57 के अंतर्गत आजीवन कारावास की गणना के संदर्भ में बताया गया है। यदि किसी परिस्थिति में आजीवन कारावास की गणना करनी होती है तो ऐसी गणना करने हेतु भारतीय दंड संहिता की इस धारा का प्रयोग किया जाता है। इस धारा के अंतर्गत आजीवन कारावास को 20 वर्ष का कारावास माना गया है, 20 वर्ष के कारावास के तुल्य माना गया है।

समय-समय पर दंड की ऐसी गणना की आवश्यकता पड़ती रहती है। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु भारतीय दंड संहिता की धारा 57 में आजीवन कारावास की गणना के लिए एक समय अवधि निर्धारित की गई है, परंतु इसका क्या अर्थ नहीं है कि किसी व्यक्ति को आजीवन कारावास दिया जाता है तो उसे 20 वर्ष की अवधि काट लेने के बाद रिहा कर दिया जाएगा। आजीवन कारावास का अर्थ शेष बचे जीवन का कारावास होता है।

दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आजीवन कारावास का लघुकरण

भारत की दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भी आजीवन कारावास के लघुकरण के संबंध में बताया गया है। धारा 433 के अंतर्गत समुचित सरकार को आजीवन कारावास को कम किए जाने की शक्ति दी गई है। यह धारा 433 (ए) के अंतर्गत ऐसी शक्ति पर निर्बंधन भी लगाए गए हैं।

धारा 433 के अंतर्गत समुचित सरकार किसी आजीवन कारावास के दोषी का कारावास कम करती है। यदि दोषी को किसी ऐसे अपराध में आजीवन कारावास दिया गया है जिस अपराध में मृत्यु दंड भी दिया जा सकता था तो ऐसे कारावास को यदि समुचित सरकार कम करती है तो केवल 14 वर्षों से के बाद के समय का कारवास कम कर सकती है या खत्म कर सकती है, अर्थात दोषी को कम से कम 14 वर्ष का कारावास तो भुगतना ही होगा।

एस निंगप्पा गन्दावर बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में भी उच्चतम न्यायालय दोषी द्वारा बालक की हत्या को गंभीर अपराध मानते हुए निर्देश दिया कि सरकार अभियुक्त के आजीवन कारावास को 14 वर्ष की अवधि से कम ना करे।

अशोक कुमार बनाम भारत संघ के वाद में भी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433 से एवं दंड संहिता संशोधन अधिनियम 1982 से संबंधित है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं तथा अंत में अपने निर्णय में यह कहा है कि किसी भी परिस्थिति में सरकार द्वारा किसी दोषी को 14 वर्ष के कारावास को भुगत लेने के बाद ही छोड़ा जाएगा।

यदि वह दोषी किसी ऐसे अपराध से दोषसिद्ध किया गया है जिस अपराध में आजीवन कारावास के अलावा मृत्युदंड भी रखा गया है। रात और दिन के लिए अलग-अलग दिन की गणना नहीं की जाती है अपितु 24 घंटे का 1 दिन गिना जाता है। 

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