हिंदू विधि भाग 14 : जानिए बगैर वसीयत के स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार (Succession) कैसे तय होता है

Update: 2020-09-14 06:58 GMT

हिंदू विधि (Hindu Law) किसी भी हिंदू पुरुष को यह अधिकार देती है कि वह अपनी कोई भी अर्जित संपत्ति को कहीं पर भी वसीयत कर सकता है। हिंदू विधि के अंतर्गत किसी भी हिंदू पुरुष को इस बात की बाध्यता नहीं है कि वह अपनी संपत्ति अपने परिवारजनों को ही वसीयत करे या उन्हें ही उत्तराधिकार में दे, स्वतंत्रतापूर्वक हिंदू पुरुष को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसकी कमाई हुई संपत्ति को अपनी इच्छा के अनुरूप कहीं भी उत्तराधिकार में दे सकता है या उसे दान कर सकता है, उसे अपना उत्तराधिकार चुनने की स्वतंत्रता है।

मुस्लिम विधि की भांति यह बाध्यता नहीं है कि उत्तराधिकारी केवल संतान और संबंधी ही होंगे। यही अर्जित संपत्ति के संबंध में जो नियम है वही नियम सहदायिकी संपत्ति के संबंध में भी लागू होते है। जो संपत्ति किसी हिन्दू पुरुष को सहदायिकी संपत्ति के रूप में प्राप्त होती उसके उत्तराधिकार के लिए भी यही नियम है।

यदि कोई हिंदू पुरुष बगैर वसीयत के मर जाता है तो इस परिस्थिति में उसके उत्तराधिकार के प्रश्न खड़े होते हैं। इस परिस्थिति को नियंत्रित करने हेतु भारत की संसद ने हिंदुओं के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 का निर्माण किया है। इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत बगैर वसीयत के स्वर्गीय होने वाले किसी हिंदू पुरुष और स्त्री दोनों की संपत्ति का उत्तराधिकार तय होता है। यह अधिनियम प्रेम और स्नेह के संबंधों के आधार पर बनाया गया है, रक्त के आधार पर जो जितने निकट होता है संपत्ति उसे मिलती है।

यह विवाद का प्रश्न है कि बगैर वसीयत किए मरने वाले व्यक्ति की संपत्ति किन उत्तराधिकारियों को किस किस भाग में प्राप्त होगी। कौन उत्तराधिकारी किस सीमा तक किसी व्यक्ति की संपत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त करने का अधिकार रखते हैं।

लेखक इस विशेष लेख के माध्यम से बगैर वसीयत के मरने वाले निर्वसीयती हिंदू पुरुष की संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के प्रावधानों पर प्रकाश डाल रहा है।

निर्वसीयती पुरुष की दशा में उत्तराधिकार के नियम - (धारा 8)

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 इस अधिनियम की सर्वाधिक महत्वपूर्ण धाराओं में से एक धारा है। इस धारा के माध्यम से भारत की संसद ने उन नियमों का प्रावधान किया है जिनके माध्यम से निर्वसीयती हिंदू पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार तय किया जाता है। जहां एक पुरुष हिंदू निर्वसीयती के रूप में स्वर्गीय हो जाता है वहां साधारण रूप से कुछ प्रश्नों का जन्म होता है जैसे उस मरने वाले व्यक्ति के वारिस कौन है।

उनका वर्गीकरण किस प्रकार किया जाना है, यदि अधिक वर्गों के वारिस या उत्तराधिकारी एक से अधिक विधमान हो तो उनमें वरीयता का क्रम या आधार क्या होगा।

कोई भी संपत्ति जब कोई व्यक्ति अर्जित करता है तो उस अर्जित संपत्ति पर उसका अधिकार जब तक ही होता है जब तक वह जीवित होता है। व्यक्ति के मरते से उसकी संपत्ति उसके उत्तराधिकारियों को न्यायगमन हो जाती है। यदि संपत्ति को अर्जित करने वाला व्यक्ति संपत्ति के संबंध में कोई वसीयत करके मारा है ऐसी परिस्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 के प्रावधानों के अनुसार उसकी संपत्ति का न्यायगमन कर दिया जाता है परंतु यदि वसीयत नहीं है तो ऐसी परिस्थिति में हिंदू पुरुष के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 का सहारा लिया जाता है। इस धारा के अंतर्गत भारत संघ के समस्त हिंदू पुरुषों की संपत्ति का उत्तराधिकार तय होता है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 बगैर वसीयत के मरने वाले हिंदू की संपत्ति का उत्तराधिकार तय करता है। संपत्ति के लिए कोई विशेष शब्द नहीं है जैसे कोई चल या अचल संपत्ति संपत्ति के लिए कोई भी मूल्यवान चीज हो सकती है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के लागू होने के लिए कुछ विशेष बातें सामने आती हैं जिससे यह धारा तभी लागू होती है जब निम्न शर्ते पूरी होती है-

1)- किसी हिंदू पुरुष की मृत्यु हुई हो।

2)- वह पुरुष इस अधिनियम के अंत में हिंदू होना चाहिए।

(हिन्दू कौन है इस संबंध में हिन्दू विवाह अधिनियम से संबंधित आलेख में उल्लेख किया जा चुका है, वही अर्थ इस हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अर्थ में भी लागू होते है)

3)- उसने अपने पीछे कोई संपत्ति छोड़ी हो।

4)- उसने अपनी संपत्ति के उत्तराधिकार के संबंध में कोई विधिमान्य वसीयत नहीं छोड़ी हो।

यदि यह शर्ते पूरी होती हैं हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के अनुसार संपत्ति का उत्तराधिकार तय होगा। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 किसी हिंदू पुरुष के संबंध में लागू होती है। किसी हिंदू नारी के संबंध में यह धारा लागू नहीं होगी। हिंदू नारी के संबंध में इस अधिनियम की धारा 15 और 16 लागू होगी जिसका उल्लेख अगले लेखों में किया जाएगा।

धारा- 8 पुरुषों की स्थिति में साधारण उत्तराधिकार के नियमों को उपबंधित करती है। यदि कोई हिंदू बिना वसीयत करे ही मर जाता है तो उसकी संपत्ति सर्वप्रथम न्यायगत होगी जो अनुसूची के वर्ग एक में विनिर्दिष्ट संबंधी हैं, इसके पश्चात यदि वर्ग एक में वारिस न हो तो उन वारिसों को न्यायगत होगी जो अनुसूची के वर्ग 2 में अंकित संबंधी है।

यदि अनुसूची के वर्ग 1 और वर्ग 2 में भी कोई वारिस न हो तो मृतक के गोत्रज को न्यायगत होगी। गोत्रज क्या होते हैं इस संबंध में लेखक द्वारा पूर्व के आलेख में उल्लेख किया जा चुका है।

यदि कोई हिंदू बिना वसीयत किए स्वर्गवासी हो जाए और उसके अनुसूची के वर्ग 1, 2 तथा गोत्रज में भी वारिस न हो तो यह संपत्ति मृतक के बंधुओं में न्यायगत होगी।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के अंतर्गत निर्वसीयती स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति जब उत्तराधिकार तय किया जाता है तो यहां पर पुत्र और पुत्री में किसी प्रकार का विभेद नहीं किया गया है। वर्तमान में जो प्रावधान इस धारा के अंतर्गत उपस्थित है उसके अनुसार स्त्री और पुरुष में समानता पूर्वक उत्तराधिकार के नियम लागू होते हैं। धारा 8 के अनुसार वारिसों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से हैं-

1)- वर्ग 1 के वारिस।

2)- वर्ग 2 के वारिस।

3)- गोत्रज।

4)- बंधु।

वारिसों का वर्गीकरण हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के भीतर समावेश की गई अनुसूची में किया गया है। इस अनुसूची में वारिसों का उल्लेख किया गया है जिन्हें संपत्ति न्यायगत होती है।

अधिनियम के अंतर्गत अनुसूची में दो प्रकार के वर्ग का उल्लेख है वर्ग-1 और वर्ग- 2। संपत्ति पहले वर्ग एक के वारिसों को मिलती है फिर वर्ग 2 के वारिसों को मिलेगी।

वर्ग 1 और वर्ग 2 के वारिसों का उल्लेख यहांं किया जा रहा है-

वर्ग-1

इस वर्ग में मुख्य रूप से पुत्र, पुत्री, विधवा और माता का समावेश किया गया है। यदि स्वर्गवासी होने वाले हिंदू पुरुष के पुत्र, पुत्री, विधवा और माता जीवित है ऐसी परिस्थिति में सभी को सामान अंश प्राप्त होगा।

यदि पुत्र या पुत्री की मृत्यु हो गई है तो ऐसी परिस्थिति में उनकी संतानों को भी उनका अंश प्राप्त होगा। यदि पुत्र के पुत्र की भी मृत्यु हो गई है तो तीसरी पीढ़ी तक अंश प्राप्त होगा। सामान्य अर्थ यह है कि किसी भी हिंदू पुरुष की संपत्ति उसके पुत्र, पुत्री, विधवा और माता को प्राप्त होती है। इस वर्ग में हिन्दू पुरुष के पिता का उल्लेख नहीं है।

पुत्र और पुत्री की मृत्यु हो गई है तो ऐसी परिस्थिति में उनकी संतानों को प्राप्त होगी अर्थात पड़ पोती और पड़ पोता तक संपत्ति न्यायगत है। जब संपत्ति के मुख्य वारिस मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं तब अगली पीढ़ी वारिस बनती है। इस अनुसूची के वर्ग एक का निर्माण इस भांति किया गया है कि चार संबंध मुख्य अधिकार रखते हैं- पुत्र, पुत्री, विधवा और माता।

वर्ग- 2

इस अनुसूची में पिता, भाई- बहन, भाई का पुत्र, बहन का पुत्र, भाई की पुत्री, बहन की पुत्री, पिता का पिता पिता की माता, पिता की विधवा, भाई की विधवा, पिता का भाई, पिता की बहन, माता का पिता, माता की माता, माता का भाई, माता की बहन।

अगले लेख में हिंदू पुरुष के उत्तराधिकार से संबंधित साधारण अन्य नियमों का उल्लेख किया जाएगा।

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