एक्सप्लेनर: सीमावर्ती राज्यों में सीमा सुरक्षा बल की बढ़ी हुई शक्तियों पर कानून

Update: 2021-10-16 07:40 GMT

गृह मंत्रालय ने हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम और पंजाब में सीमा सुरक्षा बल (बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स, बीएसएफ) के अधिकार क्षेत्र का विस्तार किया। मंत्रालय के फैसले ने संघीय ढांचे के उल्लंघन और राज्य पुलिस के अधिकारों के हनन के कारण पंजाब और पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचनाओं को न्योता दिया।

राज्यों ने तर्क दिया कि चूंकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है, इसलिए बीएसएफ अधिकार क्षेत्र में बढ़ोतरी राज्य सरकार की शक्तियों का उल्लंघन है। मौजूदा आलेख में चर्चा की गई है कि गृह मंत्रालय की शक्तियों का स्रोत क्या है, जिससे उसने बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र में बढ़ोतरी की है और किन आधारों पर राज्य दावा कर रहे हैं कि बीएसएफ की बढ़ी हुई शक्तियां उनकी पुलिस शक्तियों का उल्लंघन करती हैं?

सीमा सुरक्षा बल

बीएसएफ भारत के केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में से एक है, जिनका गठन मुख्य रूप से भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ आंतरिक खतरों से रक्षा के लिए किया गया है।

ये पुलिस बल गृह मंत्रालय के अधिकार के अंतर्गत आते हैं। अन्य सशस्त्र बल जो सीएपीएफ का हिस्सा हैं, वे हैं सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सशस्त्र सीमा बल।

बीएसएफ का मुख्य कार्य पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगी भारत की सीमा की रक्षा करना है। आईटीबीपी का मुख्य कार्य चीन के साथ लगी भारत की सीमा की रक्षा करना है और सशस्त्र सीमा बल नेपाल और भूटान के साथ लगी भारत की सीमा की रक्षा करता है।

संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और सीआरपीएफ के आतंकवाद विरोधी अभियानों के अधिकार क्षेत्र में है। सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 के तहत सीमा सुरक्षा बल की शक्ति, कर्तव्यों और अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का प्रावधान किया गया है। बीएसएफ एक्ट की धारा 139(1) केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय को बीएसएफ की अधिकार क्षेत्र की सीमा को परिभाषित करने की शक्ति देता है।

जैसा कि बीएसएफ एक्ट की अनुसूची के तहत प्रावधान किया गया है, बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र उन 10 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों तक फैला हुआ है, जिनकी पाकिस्तान या बांग्लादेश के साथ सीमा साझा होती है, जिनमें मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल और असम और जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। इन राज्यों के भीतर, बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग राज्यों के अनुसार अलग-अलग हैं।

बीएसएफ एक्ट, 1968 के तहत क्षेत्राधिकार की सीमा

2014 में जारी एक अधिसूचना में बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के पूरे राज्य, गुजरात में सीमा से 80 किलोमीटर भीतर तक, राजस्‍थान में 50 किलोमीटर भीतर तक, पंजाब, पश्चिम बंगाल और असम में 15 किलोमीटर भीतर तक रेखांकित किया गया था।

2021 अधिसूचना 2014 अधिसूचना के संशोधन करती है और पंजाब, पश्चिम बंगाल और असम में सीमा से 50 किलोमीटर भीतर तक बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र का विस्तार करती है। पहले इन राज्यों में बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र 15 किलोमीटर तक सीमित था। गुजरात में बीएसएफ की अधिकार क्षेत्र की सीमा 80 किमी से घटाकर 50 किमी कर दी गई है।

अधिकार क्षेत्र बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की शक्ति

केंद्र सरकार सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 की धारा 139 (1) के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए समय-समय पर सीमा बल के परिचालन जनादेश के क्षेत्र और सीमा को अधिसूचित कर सकता है।

धारा 139 (1) में प्रावधान है कि केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निर्देश दे सकती है कि भारत की सीमाओं से लगे ऐसे क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर, बल का कोई भी सदस्य अधिनियम के तहत ऐसी शक्तियों और कर्तव्यों का निर्वहन कर सकता है।

यह अध‌िनयम पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और बिक्री अधिनियम, विदेशी अधिनियम, फेमा, सीमा शुल्क अधिनियम, या किसी अन्य केंद्रीय अधिनियम के तहत दंडनीय किसी भी संज्ञेय अपराध को निर्दिष्ट करता है।

इसके अलावा, धारा 139 में प्रावधान है कि यदि केंद्र सरकार राज्य अधिनियम के तहत बीएसएफ के सदस्यों को कोई शक्ति या कर्तव्य प्रदान करना या उन्हें लागू करना चाहती है, तो राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है। धारा 139 की उप-धारा (3) में आगे यह अपेक्षा की गई है कि इस धारा के तहत पारित आदेश संसद के समक्ष रखे जाएं और दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाएं।

इस प्रकार, बीएसएफ एक्‍ट की धारा 139 के पाठ से यह देखा जा सकता है कि केंद्र सरकार के पास इन क्षेत्रों में सीमा सुरक्षा बल की अधिकार क्षेत्र की सीमा को बढ़ाने या घटाने की एकतरफा शक्ति है। केंद्रीय अधिनियमों के तहत बढ़ी हुई शक्तियों के मामले में राज्य सरकारों के परामर्श या सहमति का कोई वैधानिक आदेश नहीं है। बीएसएफ एक्ट राज्य की सहमति को केवल तभी अनिवार्य करता है, जब प्रदत्त शक्तियां या कर्तव्य राज्य अधिनियम के तहत हों।

बीएसएफ की बढ़ी शक्तियां और संघीय ढांचा

संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत, विधायी शक्तियों को केंद्र और राज्यों के बीच संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है। राज्य सूची (सूची II) राज्यों को सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस पर विशेष अधिकार क्षेत्र प्रदान करती है। राज्य सूची की प्रविष्टि 2 निर्दिष्ट करती है कि पुलिस राज्य का कार्य है, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रविष्टि के बाद "सूची एक की प्रविष्टि 2ए के प्रावधानों के अधीन" शब्द आते हैं।

सूची एक (संघ सूची) की प्रविष्टि 2ए में प्रावधान है, "किसी भी राज्य में नागरिक शक्ति की सहायता के लिए संघ के किसी सशस्त्र बल या संघ के नियंत्रण के अधीन किसी अन्य बल या किसी भी दल या किसी भी इकाई की तैनाती"। 

संविधान को सरसरी तौर पर पढ़ने से ही स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था पर राज्य की शक्ति पूर्ण प्रकृति की नहीं है।

यह अधिकार संघ के किसी भी सशस्त्र बल की तैनाती के साथ घिरा हुआ है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सशस्त्र बल की तैनाती की आड़ में राज्य की पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है। केवल अनुच्छेद 246 और सीमा सुरक्षा बल अधिनियम के तहत अनुमत सीमा तक ही ऐसा किया जा सकता है।

यह ध्यान देना दिलचस्प है कि 2011 में सीमा सुरक्षा बल (संशोधन) विधेयक को इस इरादे से पेश किया गया था कि बीएसएफ को देश के किसी भी हिस्से में तलाशी लेने, जब्त करने और गिरफ्तार करने की शक्तियों प्रदान की जाएं।

उस विधेयक में "भारत की सीमाओं से सटे" शब्दों को छोड़ने का प्रयास की गया था, इस प्रकार देश के सभी राज्यों में बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र का प्रभावी ढंग से विस्तार किया गया था। हालांकि विधेयक पेश नहीं हो पाया और अब तक लंबित पड़ा है। इस संबंध में नागा पीपुल्स मूवमेंट ऑफ ह्यूमन राइट्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं-

राज्य सूची की प्रविष्टि एक और संघ सूची की प्रविष्टि 2A में "नागरिक शक्ति की सहायता" अभिव्यक्ति का अर्थ है कि संघ के सशस्त्र बलों की तैनाती राज्य में नागरिक शक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव को प्रभावित करने वाली स्थिति से निपटने में सक्षम करने के उद्देश्य से होगी, जिसके कारण राज्य में सशस्त्र बलों की तैनाती आवश्यक हो गई है।

सहायता शब्द, सहायता के लिए प्राधिकरण के अस्तित्व को दर्शाता है। इसका मतलब यह होगा कि सशस्त्र बलों की तैनाती के बाद भी, नागरिक शक्ति कार्य करना जारी रखेगी।

राज्य में नागरिक शक्ति की सहायता में संघ के सशस्त्र बलों की तैनाती के लिए कानून बनाने की शक्ति में ऐसा कानून बनाने की शक्ति शामिल नहीं है, जो संघ के सशस्त्र बलों को राज्य में नागरिक शक्ति के विकल्प के रूप में कार्य करने या उन्हें हटा देने में में सक्षम बनाती है।"

इस प्रकार, सीमा सुरक्षा बल जैसे केंद्रीय बलों की अधिकार क्षेत्र की शक्तियों को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की शक्ति निम्नलिखित शर्तों द्वारा सीमित है- एक, यह भारत की सीमाओं से सटे राज्यों के संबंध में होना चाहिए; दूसरा, यदि राज्य के कानूनों के संबंध में बढ़ी हुई शक्तियां हैं तो राज्य की सहमति आवश्यक है; तीसरा, अधिसूचना/आदेश संसद के समक्ष रखा जाता है और दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाता है और चौथा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन कि संघ बलों को राज्य की नागरिक शक्ति को प्रतिस्थापित करना या हटाना नहीं चाहिए। 2021 की अधिसूचना के लिए कानूनी चुनौती, यदि कोई हो, इस आधार पर होनी चाहिए कि इसका परिणाम राज्य में नागरिक शक्ति को प्रतिस्थापित करना है या यह सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 के धारा 139 (1) द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक है।

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