सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 आदेश भाग 152: आदेश 25 नियम 1 व 2 के प्रावधान

Update: 2024-03-20 06:23 GMT

सिविल प्रक्रिया संहिता,1908(Civil Procedure Code,1908) का आदेश 25 खर्चों के लिए प्रतिभूति लेने के संबंध में है। यह आदेश संहिता में इसलिए दिया गया है जिससे न्यायालय निर्णय के पूर्व ही किसी खर्चे के संबंध में पक्षकारों से कोई प्रतिभूति जमा करवा सके। इस आलेख के अंतर्गत इस आदेश 25 के नियम 1 व 2 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।

नियम-1 वादी से खर्चों के लिए प्रतिभूति कब अपेक्षित की जा सकती है- (1) वाद के किसी प्रक्रम में न्यायालय, या तो स्वयं अपनी प्रेरणा से या किसी प्रतिवादी के आवेदन पर, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह आदेश वादी को दे सकेगा कि वह किसी भी प्रतिवादी द्वारा उपगत और संभवतः उपगत किए जाने वाले सभी खर्चों के संदाय के लिए प्रतिभूति न्यायालय द्वारा निश्चित समय के भीतर दे: परन्तु ऐसा आदेश उन सभी मामलों में किया जाएगा जिनमें न्यायालय को यह प्रतीत हो कि एकमात्र वादी या (जहां एक से अधिक वादी हों वहां) सभी वादी भारत के बाहर निवास करते हैं और ऐसे वादी के पास या ऐसे वादियों में से किसी के भी पास भारत के भीतर वादान्तर्गत संपत्ति से भिन्न कोई भी पर्याप्त स्थावर संपत्ति नहीं है।

(2) जो कोई भारत से ऐसी परिस्थितियों में चला जाता है जिनसे यह युक्तियुक्त अधिसंभाव्यता है कि जब कभी उसे खर्चे देने के लिए बुलाया जाएगा वह नहीं मिलेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि वह उपनियम (1) के परन्तुक के अर्थ में भारत के बाहर निवास करता है।]

नियम-2 प्रतिभूति देने में असफल रहने का प्रभाव (1) उस दशा में, जिसमें कि नियत समय के भीतर ऐसी प्रतिभूति नहीं दी जाती है, न्यायालय वाद को खारिज करने वाला आदेश करेगा, जब तक कि वादी या वादियों को उससे प्रत्याहृत हो जाने के लिए अनुज्ञा न दे दी गई हो।

(2) जहां वाद इस नियम के अधीन खारिज कर दिया गया है वहां वादी खारिजी अपास्त कराने के आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा और यदि न्यायालय को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि वह अनुज्ञात समय के भीतर प्रतिभूति देने से किसी पर्याप्त हेतुक से निवारित रहा है तो न्यायालय प्रतिभूति और खर्चे संबंधी ऐसे निबन्धनों पर या अन्यथा, जो वह ठीक समझे, खारिजी अपास्त करेगा और वाद में अग्रसर होने के लिए दिन नियत करेगा।

(3) जब तक कि ऐसे आवेदन की सूचना की तामील प्रतिवादी पर न कर दी गई हो खारिजी अपास्त नहीं की जाएगी।

आदेश 25, नियम के लिए प्रतिभूति न्यायालय में जमा कराने की व्यवस्था करता है।

नियम का उद्देश्य यह नियम प्रतिवादी के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है, जहां वादी भारत के बाहर निवास करता है और उससे प्रतिवादी का वादी से अपने खर्चे वसूल करने में कठिनाई आती है। अतः केवल आपवादिक मामलों में ही वादी से प्रतिभूति जमा कराने का आदेश दिया जा सकता है, केवल न्यायालय के इस प्रथम विचार से कि बाद सद्‌भाविक नहीं है, ऐसा आदेश नहीं देना चाहिये

नियम की आवश्यक शर्तें वादी से प्रतिवादी के खर्चे के लिए प्रतिभूति निम्न कारणों से मांगी जा सकती है-

(क) जहां वादी भारत (बम्बई व मध्यप्रदेश संशोधन के अनुसार राज्य) से बाहर रहता है या रहते हैं और

(ख) उनमें से किसी वादी के पास भारत में (राज्य में) पर्याप्त अचल (स्थावर) सम्पति उस वादग्रस्त सम्पत्ति के अलावा नहीं है।

अन्तर्निहित शक्ति का प्रयोग कई मतों के बावजूद नवीनतम मत यही है कि-धारा 151 के अधीन अन्तर्निहित शक्ति के प्रयोग द्वारा प्रतिभूति के लिए, सिवाय आपवादिक मामलों के, आदेश नहीं करना चाहिये।

न्यायालय का विवेकाधिकार शब्द में (may) का प्रयोग यह बताता है कि यह नियम न्यायालय के विवेकाधिकार के अधीन है, जिसका प्रयोग केवल तभी किया जाता है, जब वादी भारत के बाहर का निवासी हो और भारत में उसकी कोई अचल सम्पत्ति और नहीं हो। जब प्रतिवादी का व्यवहार सद्‌भाविक और उचित न हो, तो इस विवेकाधिकार का प्रयोग उसके पक्ष में नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार यदि आवेदन यथा समय नहीं दिया जाए, तो ऐसे पक्षकार के पक्ष में आदेश नहीं देना चाहिये। वादी का गरीब होना मात्र ही ऐसा कारण नहीं है कि उससे प्रतिभूति मांगी जाए।

यदि वादी वास्तव में विवाद करने वाला न होकर किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से वाद करता है, जो वाद का पक्षकार नहीं है, तो न्यायालय ऐसे वादी से प्रतिभूति की मांग करेगा। एक मामले में वादी अभिलेख पर दिवालिया था और वास्तविक वादी सक्षम था, जिसके पास अनेक सम्पत्तियां थी, परन्तु उस सक्षम का कोई भी सदस्य वादी के रूप में आगे नहीं आया। अतः न्यायालय उस वादी से प्रतिभूति की मांग कर सकता

आदेश 25 नियम 1 (1) का परन्तुक आज्ञापक यह परन्तुक खर्चे के लिए प्रतिभूति का आदेश करना आज्ञापक (अनिवार्य) बनाता है, जहां वादी अनिवासी हो और उनकी भारत में पर्याप्त अचल सम्पत्ति न हो। यह परन्तुक मुख्य कानून में वांछित दशा को टालने के लिए बनाया गया है। इस मामले में तीन वादियों के रूप में थे, जो अमेरिका, स्विटजरलैंड तथा फ्रांस के कानूनों के अधीन निगमित किए गये थे।

बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा जोड़ा गया आदेश 25-क-यह बेदखली के वाद के लिए ही लागू नहीं होता, परन्तु किराये की बकाया के वादों को भी लागू होता है। अतः ऐसे वाद में किराया जमा कराने के लिए यह नियम आकर्षित होगा।

आदेश 25, नियम 2 वादी द्वारा प्रतिभूति न दे पाने पर उसके प्रभाव का उपबंध करता है।

प्रतिभूति देने में वादी के असफल रहने का प्रभाव -

जब वादी नियत समय के भीतर उपनियम (1) के अनुसार चाही गई प्रतिभूति देने में असफल रहता है, तो उसका वाद खारिज कर दिया जावेगा। परन्तु यदि वादी को वाद वापस लेने की अनुमति दे दी गई हो, तो उसे खारिज नहीं किया जावेगा।

पर्याप्त कारण बताते हुए आवेदन पर ऐसी खारिजी को अपास्त किया जा सकेगा, परन्तु इसके लिए खर्चे संबंधी शर्ते लगाई जा सकेंगी। खारिजी अपास्त करने के बाद उस वाद की कार्यवाही चलेगी और उस के लिए दिन तय किया जायेगा।

जब तक खारिजी अपास्त कराने के आवेदन की सूचना की तामील प्रतिवादी पर न हो जाए, वाद की खारिजी तब तक अपास्त नहीं की जा सकेगी।

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