सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 आदेश भाग 156: आदेश 26 नियम 9 के प्रावधान

Update: 2024-03-23 08:58 GMT

सिविल प्रक्रिया संहिता,1908(Civil Procedure Code,1908) का आदेश 26 कमीशन के संबंध में है। यहां सीपीसी में कमीशन का अर्थ न्यायालय के कामों को किसी अन्य व्यक्ति को देकर न्यायालय की सहायता करने जैसा है। इस आलेख के अंतर्गत इस ही आदेश 26 के नियम 9 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।

नियम- 9 स्थानीय अन्वेषण करने के लिए कमीशन - किसी भी वाद में जिसमें न्यायालय विवाद में के किसी विषय के विशदीकरण के या किसी संपत्ति के बाजार मूल्य के या किन्हीं अन्तःकालीन लाभों या नुकसानी या वार्षिक शुद्ध लाभों की रकम के अभिनिश्चयन के प्रयोजन के लिए स्थानीय अन्वेषण करना, अपेक्षणीय या उचित समझता है, न्यायालय ऐसे व्यक्ति के नाम जिसे वह ठीक समझे, ऐसा अन्वेषण करने के लिए और उस पर न्यायालय को रिपोर्ट देने के लिए उसे निदेश देते हुए कमीशन निकाल सकेगा :

परन्तु जहां राज्य सरकार ने उन व्यक्तियों के बारे में नियम बना दिए हैं जिनके नाम ऐसा कमीशन निकाला जा सकेगा वहां न्यायालय ऐसे नियमों से आबद्ध होगा।

स्थानीय अन्वेषणों के बारे में आदेश 26 में नियम 9 से 10 में तरीका बताया गया है। नियम 9 बताता है कि- स्थानीय अन्वेषण के लिए कमीशन किन-किन परिस्थितियों में निकाला जा सकता है।

कमीशन के लिए परिस्थितियां - नियम 9 के अनुसार निम्न कार्यों की परिस्थितियों में यदि न्यायालय उचित समझे तो कमीशन निकालकर स्थानीय अन्वेषण करने का आदेश दे सकता है-

(1) विवाद के किसी विषय के विशदीकरण (उसे बढ़ाकर स्पष्ट) करने के लिए, या

(2) किसी सम्पत्ति का बाजार मूल्य का पता लगाने के लिए या

(3) (i) अन्तकालीन लाभ, या (ii) नुकसानी (डेमेजेज) या (iii) वार्षिक शुद्ध लाभ की रकम का निश्चय करने के लिए।

एक निष्कासन के वाद में किरायेदार ने यह स्वीकार किया कि वह वादग्रस्त सम्पत्ति की प्रथम मंजिल का किरायेदार है। किरायेदारी की सम्पत्ति के क्षेत्र के निर्धारण के लिए कमिश्नर की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति अनुज्ञात की गई, क्योंकि- (i) वादी एक 60 वर्षीया महिला थी, (ii) वह अनेक रोगों से ग्रस्त थी, (iii) वह सीढ़ियाँ चढ़ने में असमर्थ थी, (iv) कमिश्नर का खर्चा देने को तैयार थी तथा (v) इससे वाद के गुणागुण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।

आयुक्त कौन हो सकेगा- न्यायालय जिस व्यक्ति को ठीक समझे, स्थानीय अन्वेषण करने के लिए और उस पर न्यायालय को रिपोर्ट देने के लिए निदेश देते हुए कमीशन निकालने के लिए सक्षम है, परन्तु जहां राज्य सरकार ने ऐसे कोई नियम बना दिये हैं, तो न्यायालय उन नियमों के अनुसार आयुक्त की नियुक्ति करेगा

संहिता की प्रथम अनुसूची के आदेश 26 नियम 9 में उल्लेखित किसी कार्य हेतु जब न्यायालय किसी वाद या कार्यवाही में स्थानीय अन्वेषण किया जाना अपेक्षित एवं उचित (Requisite and Proper) समझे तो वे अपनी स्थानीय अधिकारिता में ऐसा अन्वेषण करने के लिये किसी राजस्व अधिकारी के नाम कमीशन निकाल सकेंगे।

परन्तु यह कि किसी विशेष कारण से जो विलिखित किये गये हों, ऐसा कमीशन अपनी स्थानीय अधिकारिता के बाहर स्थानीय अन्वेषण के लिये किसी राजस्व अधिकारी के नाम निकाल सकेंगे।

ऐसा कमीशन उस जिले के कलेक्टर के मार्फत निकाला जावेगा जिसके अधीनस्थ वह राजस्व अधिकारी हो और कलेक्टर को उस राजस्व अधिकारी के नाम आवश्यक स्थानीय अन्वेषण करने हेतु पृष्ठांकित करेगा। अगर कलेक्टर का यह मत हो कि वह राजस्व अधिकारी सरकार के हित को ध्यान में रखते हुए ऐसा स्थानीय अन्वेषण नहीं कर सकेगा, तब वे अपना मत कमीशन पर पृष्ठांकित कर प्रेषित करने वाले न्यायालय को वापिस कर देंगे। उनका मत निश्चायक (Conclusive) रूप से स्वीकार किया जावेगा कि उस राजस्व अधिकारी की सेवा उपलब्ध नहीं है।

इन नियमों के अधीन जिस राजस्व अधिकारी के नाम कमीशन निकाला गया है, वह मध्य प्रदेश यात्रा भत्ता नियमों के अधीन यात्रा एवं दैनिक भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी होगा।

न्यायालय द्वारा स्थानीय अन्वेषण के कार्य के किये नियत की गई फीस में भी आधी फीस सरकार को जमा की जावेगी।

कार्य की प्रकृति, स्थानीय अन्वेषण में लगने वाले अनुमानित दिन एवं दैनिक भत्ते के अतिरिक्त जेव-खर्च राजस्व अधिकारी का उस समय होगा, जबकि वह स्थानीय अन्वेषण करेगा, को ध्यान में रखकर फीस नियत की जावेगी।

कमीशन निकालने के पूर्व न्यायालय ऐसे पक्षकार या पक्षकारों से और ऐसे अनुपात (Proportions) में जैसा वे उचित समझें, यात्रा भत्ता एवं फीस न्यायालय में जमा करवायेंगे। कमीशन का निष्पादन पूर्ण होने पर राजस्व अधिकारी अपनी लिखित रिपोर्ट एवं जितनी दूरी उसने यात्रा की थी, का विवरण वापिस करेगा, तब न्यायालय उसकी जैसी उचित समझे जाँच करने पश्चात् उस नियम के अनुसार गणित कर निश्चित किया गया यात्रा भत्ता एवं उसके हिस्से की फीस का भुगतान उसे कर देंगे।

राजस्व अधिकारी इसके अतिरिक्त अन्य कोई यात्रा भत्ता या दैनिक भत्ता सरकार से प्राप्त करने का अधिकारी नहीं होगा।

नियम का उद्देश्य - आदेश 26 नियम 9 का उद्देश्य किसी पक्षकार को साक्ष्य इकट्ठी करने में सहायता करना नहीं है, जहाँ वह स्वयं साक्ष्य प्राप्त कर सकता हो। अनुश्रुत सूचना व साक्ष्य एकत्र करने के लिए कमीश्नर नियुक्त नहीं किया जा सकता। जब वकील - कमिश्नर की नियुक्ति उचित नहीं - प्रस्तावित बालिका हाईस्कूल की प्राचार्या के पद के लिए विज्ञापन निकाला गया। तो एक स्कूल के प्रधानाध्यापक ने प्रतिवादी भारतीय तेल निगम को ऐसा करने से रोकने के लिए वाद किया। यह स्पष्ट नहीं था कि महिला प्राचार्या के लिए किए गए विज्ञापन से वादी कैसे प्रभावित हुआ और कि उसे वाद-हेतुक उत्पन्न हो गया। निर्धारित कि-ऐसी परिस्थिति में बरौनी शोधयंत्र में स्कूल के अस्तित्व के बारे में पता लगाने के लिए वकील-कमिश्नर की नियुक्ति करना अनुचित था।

उपपट्टेदारी का अनुमान - जब आयुक्त की रिपोर्ट में यह दर्शित था कि - विवादित परिसर किरायेदारों के आधिपत्य में न होकर अन्य लोगों के आधिपत्य में है, तो इससे उप-पट्टेदारी का अनुमान किया जा सकता था। उच्च न्यायालय को निष्कासन (बेदखली) की डिक्री को अपास्त नहीं करना चाहिए था। कमिश्नर नियुक्त नहीं किया।

पुलिस या लोक प्राधिकारी पर लगातार सतर्कता रखने के लिए जा सकता- एक बार रेस्तरां के व्यवस्थापक भागीदार ने आवेदन किया कि-सम्बन्धित कानून व सामान्य-विधि के अधीन शक्ति के प्रयोग में कार्य करने वाले पुलिस कर्मचारियों पर सतर्कता रखने के लिए एक वकील-आयुक्त नियुक्त किया जावे। अभिनिर्धारित कि-पुलिस पर लगातार सतर्कता (निगरानी) रखने के लिए वकील-आयुक्त की नियुक्ति का अनुतोष अत्यंत अवांछनीय है। किसी मामले में स्थानीय अन्वेषण के लिए वकील-आयुक्त की नियुक्ति की जा सकती है, जो अपने विचारों की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करे, परन्तु उचित रूप से कानून के अधीन कार्य कर रहे पुलिस या लोक अधिकारियों के विरुद्ध "लगातार" निगरानी रखने के लिए वकील-आयुक्त की नियुक्ति नहीं की जा सकती। पुलिस का अधिकार है कि वह अपराध का पता लगावे और अपराध को रोके।

वादग्रस्त भूमि की पहचान के लिए आयुक्त की नियुक्ति-

एक निजी आयुक्त ने वादी और प्रतिवादी के बारे में विरोधाभासी रिपोर्ट सर्वे करने के बाद दो, तो वादी ने आदेश 26, नियम 9 के अधीन आयुक्त की नियुक्ति के लिए आवेदन किया, जो वादग्रस्त भूमि का नापजोख करके वादी की भूमि पर प्रतिवादी के अतिक्रमण का सही विस्तार का पता लगा सके। अभिनिर्धारित कि पक्षकार को आयुक्त की नियुक्ति की प्रार्थना करने की छूट थी। इन्द्रामणि बेहरा बनाम घनश्याम (1986) 62 कटक ला. टा. 398 में इस बारे में कोई साधारण वर्जन नहीं किया गया है।

म्युनिसिपल काउंसिल बनाम रामभाबती देवी (1987) 64 कटक ला. टा. 298 में यह कहा गया है कि जहाँ किसी वाद में वादग्रस्त भूमि की पहचान पर ही उसका परिणाम निर्भर करता हो, और विचारण-न्यायालय ने इस प्रयोजन के लिए बिना आयुक्त के ही विचारण किया हो, तो अपील-न्यायालय के लिए यह आवश्यक था कि वह स्थानीय अन्वेषण के लिए, सर्वे करने के लिए और पक्षकारों के भूखण्डों का नाप करने व रिपोर्ट, व नक्शा उस वादग्रस्त भूमि की पहचान दिखाते हुए देने के लिए आयुक्त नियुक्त करे।

न्यायालय ने यह पता लगाने के लिए आयुक्त नियुक्त किया कि वह अधिकार अभिलेख में वादी के भूखण्ड में गलत रूप से सम्मिलित कर लिया गया, इसका पता लगावे। विचारण-न्यायालय ने जब स्वविवेक से आयुक्त की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और प्रतिवादी के आक्षेपों को अस्वीकार दिया, तो पुनरीक्षण में उच्च न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा। कर उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि वादग्रस्त भूमि की पहचान के लिए विचारण न्यायालय द्वारा राजस्व प्राधिकारियों की सहायता ली जा सकती है।

एकपक्षीय आदेश अवैध - जब एक आवेदन द्वारा आयुक्त की नियुक्ति की यह प्रार्थना एकपक्षीय आदेश द्वारा स्वीकार कर ली गई कि आयुक्त फर्म के परिसर में घुसकर ताला आदि तोड़कर सब रिकार्ड व सामान की सूची बनाकर जब्त करले और न्यायालय में प्रस्तुत करे, तो यह अवैध है।

न्यायाधीश द्वारा स्थानीय अन्वेषण- जब न्यायाधीश ऐसा करना उचित समझे, तो वह स्वयं स्थानीय अन्वेषण करने के लिए सशक्त होता है।

जब कमीशन निकाले जा सकेंगे

किसी वादगत सम्पत्ति के, आदेश 45, नियम 5 के अधीन, मूल्य का पता लगाने के लिए कमीशन नियुक्त किया जा सकता है, पर इसका निर्णय न्यायालय को साक्ष्य की परीक्षा द्वारा करना होगा।

लेखाबहियों की सूची बनाने के लिए कमीशन नियुक्त किया जा सकता है।

अपील न्यायालय को स्थानीय अन्वेषण तथा अन्य प्रयोजनों के लिए इस नियम सपठित धारा 107 के अधीन शक्ति प्राप्त हैं, जो आदेश 41, नियम 27 से नियंत्रित नहीं होती है।

न्यायालय की शक्ति की सीमा - यह नियम न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह उस तात्विक- वाद हेतुक का विचारण करने की शक्ति एक आयुक्त को प्रत्यायोजित करे दे जिसका स्वयं न्यायालय विचारण करने के लिए बाध्य था।

आयुक्त की नियुक्ति - आयुक्त की विस्तृत रिपोर्ट पक्षकारों पर बाध्यकारी होती है, यदि उसके विरुद्ध बाहरी विचारों का उपयोग करने या कुछ करने का लोप करने के अभिकथन न हों। अपील-न्यायालय द्वारा स्वयं मौके का निरीक्षण कर उस रिपोर्ट में हस्तक्षेप करना उसकी अधिकारिता के बाहर माना गया।

कमीशन का कार्य - यदि किसी को बस्ती का नक्शा बनाने के लिए आयुक्त नियुक्त किया जाता है, तो वह किसी अन्य व्यक्ति से उसका नक्शा नहीं बनवा सकता।' इस नियम में बताये गये प्रयोजनों के लिए स्थानीय अन्वेषण किया जा सकता है, परन्तु केवल स्थानीय निरीक्षण के लिए कोई कमीशन जारी नहीं करना चाहिये। इस प्रयोजन के लिए उचित तरीका आदेश 39, नियम 7 के अधीन है।

पुनरीक्षण- (आदेश 26, नियम 9 सपठित धारा 115 का स्पष्टीकरण) आदेश 26 के नियम 9 के अधीन कमीशन निकालने से इनकार करने वाला अथवा कमीशन निकालने वाला आदेश पुनरीक्षण योग्य नहीं होगा, क्योंकि उससे पक्षकार के अधिकारों या बाध्यताओं का विनिश्चय नहीं हो सकता है और न उससे न्याय की विफलता या अन्य पक्षकार के अपूरणीय क्षति ही होती है।

कोई मामला जिनका विनिश्चय किया गया है-

स्वामित्व के दस्तावेजों के संदर्भ में विवादग्रस्त स्थान (साइट) का पता लगाने के लिए एक आयुक्त नियुक्त करने की प्रार्थना के आवेदन को खारिज कर दिया गया। अभिनिर्धारित कि यह एक विनिश्चित मामला है और पुनरीक्षण-योग्य है।

पुनरीक्षण संधारणीय - आदेश 26 के नियम 9 के अधीन आयुक्त की नियुक्ति का आदेश दिया गया। ऐसे आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण संधारणीय है।

कमीशन पर परीक्षा के लिए आवेदन पर दुबारा सुनवाई-

एक स्वत्व के वाद में बीमारी और वृद्धावस्था के आधार पर मेडिकल प्रमाण-पत्र सहित कमीशन पर परीक्षा के लिए आवेदन दिया गया। इस पर न्यायालय को अपना समाधान लेखबद्ध करना होगा कि बीमारी या कमजोरी के कारण गवाह न्यायालय में उपस्थित होने में असमर्थ है। परन्तु ऐसा समाधान लेखबद्ध नहीं करने से आदेश अवैध हो गया। न्यायालय ने पुनरीक्षण में आवेदन पर फिर से सुनवाई करने का निदेश दिया।

कमिश्नर की नियुक्ति की आवश्यकता-वादी के प्लाट की तरफ प्रतिवादी ने कोई अतिक्रमण करके ढाँचा बनाया है, इस तथ्य के संबन्ध में कमिश्नर की रिपोर्ट आवश्यक है, इसके बिना वाद डिक्री नहीं किया जा सकता है। विद्यालय के संचालन की देखरेख के लिए न्यायालय द्वारा आयुक्त नियुक्त करना उचित नहीं है।

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