सड़क चौड़ीकरण के नाम पर बिना मुआवजे दुकान तोड़ना अनुच्छेद 300A का उल्लंघन: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पंचायत विकास अधिकारी पर लगाया ₹50,000 जुर्माना
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि सड़क चौड़ीकरण जैसी सार्वजनिक परियोजनाओं के नाम पर किसी नागरिक की आवासीय या व्यावसायिक संपत्ति को बिना कानूनी अधिग्रहण प्रक्रिया अपनाए और मुआवजा दिए ध्वस्त करना संविधान के अनुच्छेद 300A का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई न केवल संपत्ति के अधिकार से वंचित करती है, बल्कि संबंधित व्यक्ति की आजीविका को भी प्रभावित करती है।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना और जस्टिस हेमा कुलकर्णी की खंडपीठ ने एक पंचायत विकास अधिकारी (PDO) की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें दुकान के अवैध विध्वंस के लिए भूमि अधिग्रहण की औपचारिक प्रक्रिया शुरू करने और उचित मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने पंचायत विकास अधिकारी पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। निर्देश दिया कि यह राशि अधिकारी अपनी जेब से चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को अदा करेगा।
कोर्ट ने कहा- संयुक्त सर्वे में अतिक्रमण नहीं मिला
मामले में कोर्ट ने कहा कि संयुक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट हुआ कि संबंधित संपत्ति पर कोई अतिक्रमण नहीं था। याचिकाकर्ता ने रजिस्टर्ड सेल डीड पेश की थी, जिसके अनुसार संपत्ति का कुल क्षेत्रफल 176 सालगाजा यानी 1,584 वर्ग फुट था। इसमें से 105 वर्ग फुट हिस्से को कथित तौर पर ध्वस्त किया गया था।
खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश द्वारा अलग-अलग मौकों पर पारित आदेशों से स्पष्ट है कि संपत्ति का विध्वंस कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अपनाए बिना किया गया।
कोर्ट ने कहा, “इसलिए, एकल न्यायाधीश के उस आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा याचिकाकर्ता की संपत्ति ध्वस्त किए जाने के लिए अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने और मुआवजा निर्धारित करने का निर्देश दिया गया है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि केवल मुआवजा देने का निर्देश पर्याप्त नहीं होगा। पंचायत विकास अधिकारी द्वारा नागरिक की संपत्ति को अवैध रूप से ध्वस्त किए जाने और हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना को देखते हुए उचित जुर्माना लगाना भी आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, ग्राम पंचायत ने 22 अक्टूबर 2023 को धर्मवीर नामक व्यक्ति को नोटिस जारी किया था। नोटिस में सड़क चौड़ीकरण के लिए उनकी संपत्ति पर कथित दो फीट अतिक्रमण हटाने की बात कही गई थी।
धर्मवीर ने बताया कि उन्होंने मई 1967 में रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से मंगलौर गांव में संबंधित संपत्ति खरीदी थी। बाद में उन्होंने वहां एक दुकान का निर्माण कराया और कपड़े का व्यवसाय शुरू किया, जिससे उनकी आजीविका चलती थी।
ग्राम पंचायत की कार्रवाई को चुनौती देते हुए उन्होंने पहली बार हाईकोर्ट का रुख किया। इस पर एकल न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि कथित अतिक्रमण वाले क्षेत्र का सर्वेक्षण किए बिना अधिकारी संपत्ति के संबंध में कोई कार्रवाई न करें। हालांकि, आरोप है कि इन निर्देशों के बावजूद ग्राम पंचायत ने आवश्यक सर्वेक्षण कराए बिना दुकान के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद धर्मवीर ने दूसरी बार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने सहायक भूमि अभिलेख निदेशक (ADLR) और स्थानीय अधिकारियों को याचिकाकर्ता की मौजूदगी में संयुक्त सर्वेक्षण कराने के लिए परमादेश (Writ of Mandamus) जारी किया।
संयुक्त सर्वेक्षण रिपोर्ट में सामने आया कि संपत्ति का कुल निर्मित क्षेत्रफल याचिकाकर्ता की रजिस्टर्ड सेल डीड में दर्ज क्षेत्रफल के अनुरूप था और उनकी संपत्ति का एक हिस्सा वास्तव में ध्वस्त किया गया था।
ग्राम पंचायत के दावों को एकल न्यायाधीश ने किया खारिज
इसके बावजूद ग्राम पंचायत ने सितंबर और अक्टूबर 2025 में दो एंडोर्समेंट जारी किए। इनमें दावा किया गया कि कोई विध्वंस नहीं हुआ और संबंधित संपत्ति पर अतिक्रमण था। इसके बाद धर्मवीर ने तीसरी बार हाईकोर्ट का रुख किया।
एकल न्यायाधीश ने ग्राम पंचायत के दोनों एंडोर्समेंट रद्द कर दिए और अधिकारियों को औपचारिक भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने तथा तीन महीने के भीतर पूरा मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए पंचायत विकास अधिकारी ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद विध्वंस पर अधिकारी को लगाई फटकार
अपील खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि पंचायत विकास अधिकारी ने हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद संपत्ति को ध्वस्त किया। यहां तक कि संयुक्त सर्वेक्षण पूरा होने का इंतजार भी नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा कि एक नागरिक की संपत्ति को अवैध रूप से ध्वस्त करने और उसके कारण हुए नुकसान को देखते हुए अधिकारी पर उचित जुर्माना लगाया जाना आवश्यक है।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखते हुए पंचायत विकास अधिकारी को अपनी जेब से 50,000 रुपये याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।