कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक वकील को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है, जिस पर एक महिला के साथ बार-बार रेप, अप्राकृतिक यौन अपराध और जाति आधारित दुर्व्यवहार करने के आरोप हैं। अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और मामले में जांच की आवश्यकता है।

जस्टिस राजेश्वरी एन. हेगड़े की पीठ ने आरोपी की उस आपराधिक अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने सत्र न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत देने से इनकार करने के आदेश को चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में कथित निजी वीडियो, फोनपे लेनदेन, वित्तीय रिकॉर्ड, लॉज के रजिस्टर, डिजिटल तस्वीरों और व्हाट्सऐप संदेशों की जांच की जानी आवश्यक है

अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता और जांच के लिए आवश्यक सामग्री को देखते हुए आरोपी अग्रिम जमानत पाने का हकदार नहीं है।

क्या है मामला?

मामला शाहपुरा पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला के अनुसार, आरोपी वकील जनवरी 2024 में उसके घर आया था, जहां उसने कथित तौर पर जबरन यौन संबंध बनाए।

महिला ने आरप लगाया कि इसके बाद आरोपी ने उसे ब्लैकमेल किया, अप्राकृतिक यौन अपराध किए, उसकी निजी तस्वीरें और वीडियो बनाए तथा जातिसूचक गालियां दीं।

शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n), 377, 504 और 506 के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।

IPC की धारा 376(2)(n) एक ही महिला के साथ बार-बार रेप करने से संबंधित है, जबकि धारा 377 अप्राकृतिक यौन अपराधों से संबंधित है। धारा 504 जानबूझकर अपमान करने और धारा 506 आपराधिक धमकी से संबंधित है।

आरोपी ने पहले सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत की मांग की थी। वहां याचिका खारिज होने के बाद उसने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

जस्टिस राजेश्वरी एन. हेगड़े ने मामले की गंभीरता और जांच के लिए आवश्यक साक्ष्यों पर विचार करते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि शिकायत में लगाए गए गंभीर आरोपों के अलावा कई ऐसे दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य भी हैं, जिनकी जांच जांच अधिकारी द्वारा की जानी आवश्यक है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी और सत्र न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

आरोपी ने क्या दलील दी?

आरोपी ने शिकायत को मनगढ़ंत बताते हुए दावा किया कि महिला ने उससे लिए गए अग्रिम ऋण की राशि वापस नहीं की थी, जिसके कारण उसके खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया गया।

उसने शिकायत दर्ज कराने में दो साल से अधिक की कथित देरी पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता और मामले में आवश्यक जांच को देखते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए क्लिक करें 

Tags: