प्रथम दृष्टया कोई आरोप नहीं: श्री श्री रविशंकर के खिलाफ कथित भूमि अतिक्रमण मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने जांच पर लगाई रोक

Update: 2026-01-14 09:30 GMT

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 13 जनवरी को आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के खिलाफ दर्ज कथित भूमि अतिक्रमण के मामले में चल रही जांच पर 21 जनवरी तक रोक लगाई।

श्री श्री रविशंकर इस मामले में एक FIR में आरोपी बनाए गए, जो बेंगलुरु में सार्वजनिक भूमि पर कथित अतिक्रमण से जुड़ी है।

उल्लेखनीय है कि इससे एक सप्ताह पहले हाईकोर्ट ने जांच पर रोक लगाने या कोई अंतरिम संरक्षण देने से इनकार कर दिया।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि शिकायत का अवलोकन करने पर प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई ठोस आरोप सामने नहीं आता।

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिना किसी विशिष्ट आरोप के किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में घसीटा नहीं जा सकता, जब तक कि अगली सुनवाई की तारीख पर विशेष लोक अभियोजक ऐसा कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर न रखें जिससे यह संकेत मिले कि याचिकाकर्ता किसी कृत्य में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने श्री श्री रविशंकर के संबंध में जांच को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया।

यह मामला बेंगलुरु महानगर कार्यबल पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है, जिसमें कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 की धारा 192ए के तहत अपराध का आरोप लगाया गया। इस धारा के तहत यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से सरकारी भूमि में प्रवेश करता है या उस पर कब्जा करता है, तो उसे एक वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।

यह FIR हाईकोर्ट की ही एक खंडपीठ द्वारा पारित जनहित याचिका के आदेश के आधार पर दर्ज की गई। उस जनहित याचिका में यह आरोप लगाया गया कि कुछ व्यक्तियों ने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण किया और यहां तक कि राजाकालुवे, यानी झीलों को जोड़ने वाले वर्षा जल निकासी नाले पर भी निर्माण कर लिया गया।

इस जनहित याचिका में श्री श्री रविशंकर को अन्य व्यक्तियों के साथ प्रतिवादी बनाया गया और बाद में उन्हें FIR में भी आरोपी के रूप में शामिल कर लिया गया।

खंडपीठ ने अपने आदेश में यह उल्लेख किया कि मानचित्र के अनुसार काग्गलिपुरा गांव, उत्तराहल्ली होबली, बेंगलुरु दक्षिण तालुक के कुछ सर्वे नंबरों में निर्माण कार्य किया गया और एक बड़े हिस्से में, जिसे तालाब बताया गया, अतिक्रमण पाया गया।

राज्य सरकार के इस रुख को ध्यान में रखते हुए कि वास्तव में सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण हुआ, खंडपीठ ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि कानून के अनुसार अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

राज्य की ओर से विशेष लोक अभियोजक ने दलील दी कि जनहित याचिका में श्री श्री रविशंकर का नाम प्रतिवादी के रूप में आया, जिसके आधार पर यह FIR दर्ज की गई।

उन्होंने कहा कि बेंगलुरु महानगर कार्यबल पुलिस ने कानून के अनुसार पूरी प्रक्रिया का पालन किया और FIR दर्ज करने में कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं की गई।

वहीं श्री श्री रविशंकर की ओर से पेश अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इस मामले में पहले से ही हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय के जरिए स्थिति स्पष्ट हो चुकी है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि वह निर्णय इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता, क्योंकि वह अलग परिस्थितियों में दिया गया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में बेंगलुरु महानगर कार्यबल को विधिसम्मत अधिसूचना के जरिए पुलिस का दर्जा प्राप्त है, इसलिए उस आधार पर कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने यह अंतरिम निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान स्तर पर श्री श्री रविशंकर के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं बनता और इसी कारण उनके संबंध में जांच पर अस्थायी रोक लगाई गई।

मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को निर्धारित की गई।

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