45 साल बाद जमीन बहाली का दावा खारिज: झारखंड हाइकोर्ट का बड़ा फैसला, 1947 से पहले के सौदों पर नहीं लागू होंगे नियम

Update: 2026-03-23 10:56 GMT

झारखंड हाइकोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि 1947 से पहले हुए भूमि हस्तांतरण पर धारा 46 लागू नहीं होती और 45 साल की देरी से दायर बहाली याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने यह निर्णय देते हुए निचली प्राधिकरणों के आदेशों को रद्द किया, जिनमें जमीन बहाली की अनुमति दी गई थी।

मामले में याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उनके पूर्वज को वर्ष 1939-40 में विधिवत पंजीकृत पट्टा के जरिए जमीन दी गई। बाद में 1952 में सिविल कोर्ट के फैसले ने उनके स्वामित्व और कब्जे की पुष्टि की और 1964 के रिकॉर्ड ऑफ राइट्स में भी उनका नाम दर्ज हो गया।

हाइकोर्ट ने पाया कि इन तीनों आधारों पंजीकृत पट्टा, सिविल कोर्ट का फैसला और राजस्व रिकॉर्ड से याचिकाकर्ताओं का अधिकार स्पष्ट रूप से स्थापित होता है, जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 46, जिसमें उपायुक्त की अनुमति आवश्यक होती है 1947 में लागू हुई। चूंकि संबंधित जमीन का हस्तांतरण 1939-40 में हुआ था, इसलिए इस प्रावधान को उस पर लागू नहीं किया जा सकता।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि 1985 में दायर बहाली आवेदन लगभग 45 साल बाद किया गया, जो अत्यधिक देरी है और कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल धोखाधड़ी के आरोप लगाकर इतने लंबे समय बाद किसी स्थापित अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। खासकर जब उसके समर्थन में वैध दस्तावेज मौजूद हों।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कानून की सही व्याख्या नहीं की और बिना उचित आधार के याचिकाकर्ताओं के अधिकार में हस्तक्षेप किया।

अंततः हाइकोर्ट ने बहाली के आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।

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