झारखंड हाईकोर्ट ने गैंगरेप के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपियों की अपील खारिज करते हुए उनकी सजा बरकरार रखी।

कोर्ट ने पीड़िता की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय और भरोसेमंद माना। उसने कहा कि FIR दर्ज कराने में तीन दिन की देरी, आरोपियों के नाम नहीं बता पाना और घटना के 72 घंटे बाद मेडिकल जांच में वीर्य नहीं मिलना, पीड़िता की गवाही को अविश्वसनीय बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। खासकर तब, जब उसके शरीर पर मिले चोटों के निशान उसकी बातों की पुष्टि करते हों।

जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच जमशेदपुर के ईस्ट सिंहभूम स्थित एडिशनल सेशंस जज-X-सह-फास्ट ट्रैक कोर्ट के 23 अगस्त, 2018 के दोषसिद्धि फैसले और 29 अगस्त, 2018 के सजा आदेश के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी।

ट्रायल कोर्ट ने प्रत्येक आरोपी को 20 साल के कठोर कारावास और 40,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार 5 नवंबर, 2013 को पीड़िता अपने ससुराल से मायके जा रही थी। इसी दौरान लापिट छेंचा जंगल में एपीओ टोला-जेर्का-अमदा पहाड़ी के पास चार आरोपियों ने कथित तौर पर उसे घेर लिया, पकड़कर एक नाले की ओर ले गए और बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया। आरोप है कि आरोपियों ने उसका मुंह दबा दिया था और शोर मचाने पर उसे पानी में डुबोकर मारने की धमकी दी थी।

आसपास किसी के आने-जाने की आहट सुनकर आरोपी मौके से भाग गए। इसके बाद पीड़िता ने शोर मचाया और उसे प्रकाश हेम्ब्रम (अभियोजन पक्ष के गवाह नंबर 1) के घर ले जाया गया, जहां उसने रात बिताई। अगले दिन गांव में पंचायत बुलाई गई, लेकिन आरोपी उसमें शामिल नहीं हुए। इसके बाद 8 नवंबर, 2013 को FIR दर्ज कराई गई।

हाईकोर्ट ने FIR दर्ज कराने में तीन दिन की देरी के संबंध में पीड़िता के स्पष्टीकरण को स्वीकार किया।

कोर्ट ने ध्यान दिया कि वह एक अशिक्षित विधवा थी और ऐसे गांव में रहती थी, जहां पुलिस के पास जाने से पहले पंचायत बुलाने की परंपरा थी। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पीड़िता को आरोपियों के नाम पहली बार पंचायत के दौरान पता चले थे।

बचाव पक्ष ने यह दलील भी दी कि पीड़िता आरोपियों के नाम नहीं बता सकी, इसलिए उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता ने अदालत में आरोपियों को उनके चेहरे से पहचाना था। मेडिकल साक्ष्य भी उसकी गवाही की पुष्टि करते थे। जांच में उसकी पीठ, स्तन, कलाई और पैर पर चोटों के निशान पाए गए थे, जो उसके साथ हुई हिंसा की ओर संकेत करते थे।

मेडिकल जांच में वीर्य नहीं मिलने के सवाल पर हाईकोर्ट ने कहा कि घटना और मेडिकल परीक्षण के बीच 72 घंटे का अंतर है। पीड़िता की उम्र भी लगभग 50 वर्ष है। इन परिस्थितियों को देखते हुए वीर्य का पता नहीं चलना स्वाभाविक है।

कोर्ट ने कहा कि शरीर के अन्य हिस्सों, विशेषकर स्तन और पीठ के निचले हिस्से पर मिले हिंसा के निशान दुष्कर्म की घटना की पुष्टि करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं।

हाईकोर्ट ने कहा,

“दुष्कर्म की घटना और मेडिकल जांच के बीच 72 घंटे का अंतर था, इसलिए वीर्य का पता नहीं चलना स्वाभाविक है। हालांकि, शरीर के अन्य हिस्सों, खासकर स्तन और पीठ के निचले हिस्से पर हिंसा के निशान घटना की पुष्टि करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं।”

बचाव पक्ष की इस दलील को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया कि पीड़िता ने आरोपियों को झूठा फंसाया।

कोर्ट ने कहा कि इस दावे के समर्थन में कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया गया। सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पीड़िता को विश्वसनीय गवाह माना और निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को गैंगरेप के अपराध में दोषी ठहराने में कोई गलती नहीं की थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सभी अपीलें खारिज कर दीं और आरोपियों की 20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी।

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