दिव्यांगों के अधिकारों से जुड़े मामलों में विशेष संवेदनशीलता जरूरी, सेवा विवाद होने पर भी जनहित याचिका सुनवाई योग्य: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में सामान्य सेवा विवादों पर लागू प्रतिबंध के बावजूद जनहित याचिका पर विचार किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि दिव्यांगजनों से जुड़े मुद्दों को "विशेष संवेदनशीलता" के साथ देखा जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वर्ष 2018 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई, जिसके तहत भर्ती प्रक्रियाओं में दिव्यांगता प्रमाणपत्र का एक निर्धारित प्रारूप अनिवार्य किया गया।
झारखंड लोक सेवा आयोग की ओर से याचिका की ग्राह्यता पर आपत्ति जताई गई। आयोग का कहना था कि सेवा मामलों से संबंधित विवादों में सामान्यतः जनहित याचिकाएं स्वीकार नहीं की जातीं। साथ ही याचिकाकर्ता पहले ही अपनी व्यक्तिगत क्षमता में एक अलग रिट याचिका दायर कर चुकी हैं, इसलिए वर्तमान याचिका को जनहित याचिका के रूप में नहीं सुना जाना चाहिए।
इसके जवाब में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि लंबित रिट याचिका एक पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया से संबंधित है, जिसमें निर्धारित प्रारूप में दिव्यांगता प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं कर पाने के कारण उनका चयन नहीं हो सका था। जबकि वर्तमान जनहित याचिका भर्ती प्रक्रियाओं में वर्ष 2018 की अधिसूचना के तहत निर्धारित प्रारूप को लगातार लागू किए जाने को चुनौती देती है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि वर्ष 2018 की अधिसूचना संभवतः 1995 के दिव्यांग व्यक्तियों से संबंधित कानून के तहत बनाई गई और इसमें 2016 के नए कानून के तहत मान्यता प्राप्त अतिरिक्त दिव्यांगताओं को शामिल नहीं किया गया। इससे बड़ी संख्या में दिव्यांग अभ्यर्थी प्रभावित हो सकते हैं, जिनके लिए व्यक्तिगत रूप से अदालत का दरवाजा खटखटाना आसान नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा,
"यद्यपि हम सामान्यतः सेवा मामलों में जनहित याचिकाएं स्वीकार नहीं करते और न ही वैधानिक प्रावधानों की वैधता से जुड़े प्रश्नों पर इस प्रकार विचार करते हैं, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि हम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे से सामना कर रहे हैं। ऐसे मामलों को विशेष संवेदनशीलता के साथ संबोधित किया जाना चाहिए।"
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला किसी वैधानिक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को सीधी चुनौती देने का नहीं है, बल्कि यह आरोप लगाया गया कि 3 अप्रैल 2018 की अधिसूचना वर्ष 2016 के कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों के विपरीत है।
याचिका को व्यक्तिगत हित से प्रेरित बताने वाली दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को इस मामले से कुछ आकस्मिक लाभ मिल भी सकता है, तो केवल यही कारण जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करने के लिए पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब मामला ऐसे वर्ग से जुड़ा हो, जिसके लिए अदालतों तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता।
हाईकोर्ट ने माना कि यह मुद्दा दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस पर स्पष्टता आने से व्यापक रूप से दिव्यांग अभ्यर्थियों को लाभ मिलेगा। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को जनहित याचिका के रूप में पंजीकृत करने का निर्देश दिया।
साथ ही खंडपीठ ने वर्ष 2025 की लंबित रिट याचिका का अभिलेख भी तलब करने का आदेश दिया और कहा कि दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई की जाएगी ताकि परस्पर विरोधी निर्णयों की स्थिति उत्पन्न न हो।