सिर्फ़ विरोध मार्च में शामिल होने से कोई व्यक्ति 'गैर-कानूनी सभा' का हिस्सा नहीं बन जाता: हिमाचल हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ़ विरोध मार्च में शामिल होने से कोई व्यक्ति IPC की धारा 149 के तहत 'गैर-कानूनी भीड़' (Unlawful Assembly) का सदस्य नहीं बन जाता।
कोर्ट ने पाया कि जब याचिकाकर्ताओं ने हिंसा देखी तो वे उपद्रवी भीड़ से अलग हो गए और हमला झेल रहे शिक्षकों को बचाने की कोशिश की। इसलिए उन्हें 'गैर-कानूनी भीड़' का सदस्य नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा:
"चूंकि याचिकाकर्ताओं ने कुछ लोगों को शिक्षकों के साथ मारपीट करते देखा और वे मार्च से अलग हो गए तथा शिक्षकों को बचाने की कोशिश की... इसलिए उन्हें 'गैर-कानूनी भीड़' का हिस्सा नहीं कहा जा सकता।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 29 जुलाई 2017 को आयोजित एक विरोध मार्च से जुड़ा है। यह मार्च सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, खुशीनगर, चुराह में एक शिक्षक द्वारा स्कूल की छात्रा के यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद निकाला गया।
कुछ प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए और उन्होंने कई शिक्षकों के साथ मारपीट की। इसके बाद याचिकाकर्ताओं समेत कई लोगों के खिलाफ IPC की विभिन्न धाराओं के तहत FIR नंबर 82/2017 दर्ज की गई।
पुलिस द्वारा चालान पेश करने के बाद याचिकाकर्ताओं ने FIR रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि वे विरोध प्रदर्शन में शामिल तो थे, लेकिन न तो उन्होंने शिक्षकों के साथ मारपीट की और न ही वे हिंसक भीड़ के 'साझा मकसद' (Common Object) में शामिल थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि विरोध मार्च या अपराध स्थल पर सिर्फ़ मौजूद रहने से कोई व्यक्ति स्वतः ही 'गैर-कानूनी भीड़' का सदस्य नहीं बन जाता। IPC की धारा 149 के तहत दायित्व तय करने के लिए यह ज़रूरी है कि आरोपी भीड़ के 'साझा मकसद' में शामिल रहा हो।
कोर्ट ने पाया कि दिलदार अली बट्ट और परवेज अली बट्ट हिंसक भीड़ से अलग हो गए और उन्होंने शिक्षकों को बचाने की कोशिश की। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता और घायल शिक्षकों ने उन लोगों के नाम बताए, जिन्होंने उन पर हमला किया था, जबकि याचिकाकर्ताओं का नाम हमलावरों के तौर पर नहीं लिया गया।
कोर्ट ने आगे कहा कि IPC की धारा 149 के दूसरे हिस्से में 'जानना' (knew) शब्द का मतलब पक्की जानकारी होना है, न कि सिर्फ़ संभावना होना। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ताओं को इस बात की जानकारी थी कि विरोध प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों का इरादा शिक्षकों के साथ मारपीट करने का है।
इसके बाद कोर्ट ने पाया कि दोषी ठहराए जाने की संभावना "बहुत कम" थी और कार्यवाही जारी रखने का कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द किया।
Case Name: Dildar Ali Batt & others v/s State of H.P. & another