गुजरात यूनिवर्सिटी ने बुधवार (16 सितंबर) को गुजरात हाईकोर्ट से आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल पर हर्जाना लगाने की मांग की। केजरीवाल ने सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) के उस आदेश को रद्द करने के फैसले को चुनौती देते हुए अपील की थी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।

यूनिवर्सिटी की ओर से चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन रे की डिवीजन बेंच के सामने पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हर्जाना लगाया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि RTI एक्ट का गलत इस्तेमाल न हो और सरकारी अधिकारियों को ऐसे अनुरोधों से निपटने में अपने काम के कीमती घंटे बर्बाद न करने पड़ें, जिनका एक्ट के मकसद से कोई लेना-देना नहीं है।

बेंच केजरीवाल की उस अपील पर सुनवाई कर रही है, जो मार्च 2023 के एक सिंगल जज के फैसले के खिलाफ है। उस फैसले में CIC के 2016 के निर्देश को रद्द कर दिया गया, जिसमें गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर जारी डिग्री से जुड़ी जानकारी देने के लिए कहा गया।

सिंगल जज ने माना था कि प्रधानमंत्री की एजुकेशनल डिग्री से जुड़ी जानकारी RTI Act की धारा 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है, क्योंकि इसे सार्वजनिक करने के लिए कोई बड़ा जनहित नहीं है। कोर्ट ने केजरीवाल पर ₹25,000 का हर्जाना भी लगाया।

सॉलिसिटर जनरल ने CBSE और अन्य बनाम आदित्य बंदोपाध्याय और अन्य (2011) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में RTI Act के तहत जानकारी के लिए बिना सोचे-समझे और अव्यावहारिक मांगें करने के खिलाफ चेतावनी दी गई और कहा गया कि ऐसी मांगें सरकारी अधिकारियों के संसाधनों को उत्पादक प्रशासनिक कार्यों से भटका सकती हैं।

फैसले का जिक्र करते हुए मेहता ने कहा,

"अपील पर मेरिट के आधार पर सुनवाई और फैसला हो सकता है। और हर्जाना भी लगाया जा सकता है। ताकि RTI Act के तहत विधायिका के नेक मकसद और इरादे का गलत इस्तेमाल या दुरुपयोग न हो और अधिकारी अपना समय बेकार के कामों में बर्बाद न करें... यहां जनहित क्या है? मान लीजिए किसी खास पद के लिए फिजिक्स में डॉक्टरेट जरूरी योग्यता है और कोई यह मुद्दा उठाता है कि वह व्यक्ति सार्वजनिक पद पर है लेकिन उसके पास PhD की डिग्री नहीं है। इसलिए मैं यूनिवर्सिटी से जानकारी मांग रहा हूं, तो यह जनहित होगा, क्योंकि उस पद पर बने रहना उस डिग्री पर निर्भर करता है। RTI सिर्फ़ उत्सुकता रखने वालों के लिए बनाया गया कानून नहीं है।"

शुरुआत में SG ने कहा कि यह मामला यूनिवर्सिटी से पास हुए छात्रों की डिग्री से जुड़ा है और यह देखना है कि क्या यह RTI Act की धारा 8(1)(e) और (j) के तहत छूट के दायरे में आता है।

SG ने कहा,

"सवाल जिस डिग्री का है, वह एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की है। यूनिवर्सिटी को इस मामले में डिग्री बताने या ज़ाहिर करने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन यूनिवर्सिटी सैद्धांतिक तौर पर इसका विरोध कर रही है क्योंकि हमने लाखों छात्रों को डिग्री दी है और इसलिए इस कानून को स्पष्ट करने की ज़रूरत है..."

SG मेहता ने 'फिड्यूशरी रिलेशनशिप' (भरोसे का रिश्ता) की अवधारणा पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का ज़िक्र किया, जिसका ज़िक्र धारा 8(1)(e) में है। इसके अनुसार, किसी व्यक्ति को भरोसे के रिश्ते में मिली जानकारी का खुलासा करने की ज़रूरत नहीं है, जब तक कि सक्षम अधिकारी इस बात से संतुष्ट न हो कि व्यापक जनहित में ऐसी जानकारी का खुलासा करना ज़रूरी है।

इस चरण पर कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा,

"हमारा मानना ​​है कि कोई RTI आवेदन था ही नहीं। जानकारी मांगने के लिए कोई आगे नहीं आया।"

इस पर SG ने कहा कि कोर्ट सही कह रहा है और कोई आवेदन नहीं किया गया।

उन्होंने बताया कि कार्यवाही केजरीवाल से जुड़ी जानकारी के लिए एक अलग अनुरोध से शुरू हुई, जिसके बाद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़ी जानकारी मांगते हुए जवाब दिया।

बता दें, दूसरी अपील में CIC ने केजरीवाल के जवाब को नागरिक के तौर पर RTI आवेदन माना और जानकारी ज़ाहिर करने का आदेश दिया (जिसे बाद में रद्द कर दिया गया)।

इसके बाद कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि उसकी समझ के अनुसार, ऐसा आदेश पारित करने का पहला कदम ही अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

कोर्ट ने आगे मौखिक रूप से कहा,

"अगर कोई आवेदन नहीं है तो जानकारी ज़ाहिर करने का सवाल ही नहीं उठता, हमारी समझ के अनुसार... RTI की एक प्रक्रिया है। किसी को आवेदन दाखिल करना होता है। सही जानकारी देनी होती है कि वह क्या जानकारी मांग रहा है। तभी आवेदन पर कार्रवाई हो सकती है। आवेदन करने और उस पर कार्रवाई करने की एक प्रक्रिया है।"

SG ने सहमति जताते हुए कहा कि RTI Act अपने आप में एक पूर्ण कानून है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि न तो यूनिवर्सिटी और न ही वह व्यक्ति जिसकी जानकारी मांगी गई, इस मामले में पक्षकार थे।

इसके बाद कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि एक्ट के तहत प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए, जिसमें अधिकारी को धारा 8 के तहत छूट पर विचार करना होगा और जिस व्यक्ति की जानकारी दी जा रही है, उसे अपील का अधिकार होगा; यहाँ वह अधिकार भी छीन लिया गया।

कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा,

"नहीं तो इस कानून का गलत इस्तेमाल होगा।"

अब यह मामला 21 सितंबर को दोपहर 2:30 बजे केजरीवाल के जवाब (rejoinder submissions) के लिए लिस्ट किया गया।

Case title: ARVIND KEJRIWAL v/s GUJARAT UNIVERSITY & ORS.

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: