गुजरात हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पेंशनभोगी की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी का पारिवारिक पेंशन पर अधिकार केवल इस आधार पर खत्म नहीं हो सकता कि पति ने अपने जीवनकाल में पत्नी के बजाय किसी अन्य व्यक्ति, यहां तक कि अपने बेटों को नामांकित किया।

जस्टिस नीरल आर. मेहता ने कहा कि पारिवारिक पेंशन का अधिकार वैधानिक प्रावधानों से तय होता है। इसके लिए मुख्य सवाल यह है कि पेंशनभोगी की मृत्यु के समय दावा करने वाला व्यक्ति उसकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी या पति था या नहीं।

अदालत राजकोट नगर निगम की एक महिला कर्मचारी की विधवा पत्नी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने अपने पति की मृत्यु के बाद 27 अगस्त 2025 से पारिवारिक पेंशन जारी करने और बकाया राशि पर ब्याज सहित भुगतान की मांग की।

याचिकाकर्ता के पति राजकोट नगर निगम के विद्युत विभाग में लाइनमैन के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने 30 अप्रैल 2024 को सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने पर सेवा से अवकाश लिया था। उन्होंने करीब 30 साल, सात महीने और 16 दिन की सेवा पूरी की थी।

पति-पत्नी के बीच वैवाहिक मतभेद जरूर थे, लेकिन उनका विवाह कभी समाप्त नहीं हुआ। उनके बीच न तो तलाक की कोई कार्यवाही शुरू हुई थी और न ही किसी अदालत ने तलाक की डिक्री पारित की थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि नगर निगम ने फैमिली पेंशन जारी करने से इस आधार पर इनकार किया कि उसके पति ने जीवनकाल में एक शपथपत्र देकर निगम से कहा कि उनके सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ पत्नी को जारी न किए जाएं। पेंशन के नामांकन पत्र में भी पत्नी का नाम नहीं था, बल्कि दोनों बेटों को नामांकित किया गया।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने अबेदाखातून वाई. मलिक बनाम पेंशन एवं भविष्य निधि निदेशक मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ के 2011 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पारिवारिक पेंशन किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि वैधानिक प्रावधानों के अनुसार तय होती है।

अदालत ने कहा,

पेंशनभोगी ने पत्नी को नामांकन से बाहर कर किसी तीसरे व्यक्ति को नामांकित किया हो, तब भी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी या विधवा का पारिवारिक पेंशन का अधिकार खत्म या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

जस्टिस मेहता ने कहा कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता और मृतक के बीच विवाह पति की मृत्यु तक कायम था। तलाक की कोई डिक्री नहीं थी और ऐसे में पूर्व की खंडपीठ के फैसले का सिद्धांत इस मामले पर पूरी तरह लागू होता है।

हाईकोर्ट ने राजकोट नगर निगम को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की फैमिली पेंशन निर्धारित कर तीन महीने के भीतर जारी करे। इसके बाद पेंशन की बकाया राशि का भी अगले तीन महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया गया।

अदालत ने महिला की याचिका स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि नामांकन किसी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के उस वैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता, जो उसे फैमिली पेंशन के रूप में प्राप्त है।

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