गुजरात हाईकोर्ट में निवासियों की शिकायत: सूरत में तोड़े गए घरों के बदले मिलने वाले मकान जर्जर हालत में
सूरत के नासिर नगर में जून में चलाए गए कथित अवैध ध्वस्तीकरण अभियान में घर गंवाने वाले निवासियों ने गुजरात हाईकोर्ट में दावा किया कि पुनर्वास के लिए अब जिन मकानों का प्रस्ताव दिया जा रहा है उनकी हालत बेहद खराब और जर्जर है। निवासियों ने यह भी आरोप लगाया कि पहले उन्हें जहां मकान देने का आश्वासन दिया गया, बाद में पुनर्वास का स्थान बदल दिया गया।
जस्टिस निखिल एस. करियल की अदालत में सोमवार को नासिर नगर के प्रभावित निवासियों की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई।
निवासियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने बताया कि उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जहांगीरपुरा में मकान देने का आश्वासन दिया गया। उनके अनुसार निवासियों ने वहां जाकर मकानों की स्थिति देखी थी और उन्हें रहने योग्य पाया था। इसी आधार पर उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार किया।
वकील ने कहा कि पूरी प्रक्रिया इस आधार पर आगे बढ़ाई गई कि मकान जहांगीरपुरा में आवंटित किए जाएंगे लेकिन बाद में निवासियों को बिना किसी पूर्व सूचना के अदाजन और भेस्तान में मकान स्वीकार करने के लिए कहा जाने लगा।
उन्होंने अदालत के सामने प्रस्तावित मकानों की तस्वीरें पेश करते हुए उनकी स्थिति पर भी सवाल उठाया। वकील ने कहा कि निवासियों को एक बेडरूम और एक हॉल वाला मकान देने का आश्वासन दिया गया, लेकिन अब उन्हें केवल एक कमरा और छोटी रसोई मिल रही है और वह भी जर्जर हालत में है।
मामले की शुरुआत में नगर निगम की ओर से पेश एडवोकेट जनरल ने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने करीब 100 पन्नों का हलफनामा दाखिल किया और उसका जवाब देने के लिए समय मांगा।
इस दौरान निवासियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने भी मामले को अगली सुनवाई तक जारी रखने का अनुरोध किया। दोनों पक्षों के अनुरोध को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले को आंशिक रूप से सुना गया मामला मानते हुए आगे की सुनवाई के लिए रखा और नगर निगम को दाखिल हलफनामे पर जवाब देने के लिए समय दिया।
यह मामला जून में सूरत के नासिर नगर में हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाई से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने उस समय प्रथम दृष्टया टिप्पणी की थी कि यदि पुलिस बंदोबस्त किसी सीमांकन की कार्रवाई के लिए मांगा गया और सीमांकन की आड़ में नगर निगम की ओर से मकान गिराए जा रहे थे तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का कर्तव्य था कि वे हस्तक्षेप कर ऐसी कार्रवाई को रोकते।
इससे पहले राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि सूरत नगर निगम के संबंधित आयुक्त का तबादला कर उन्हें दूसरे पद पर नियुक्त किया गया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि मामले की जांच लंबित रहने के दौरान सूरत नगर आयुक्त और पुलिस विभाग के सीनियर अधिकारियों को उनके पदों पर क्यों बने रहने दिया जा रहा था।
मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर 2026 को होगी।