गुवाहाटी हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की डिवीज़न बेंच ने कहा कि वकील रिट याचिका दायर करने के बाद याचिकाकर्ता के असल ठिकाने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हो सकते। हालांकि, वकालतनामा स्वीकार करते समय उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए और मुवक्किल की असलियत के बारे में खुद को संतुष्ट करना चाहिए।

पृष्ठभूमि की जानकारी

अपीलकर्ता गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील है। वह एक मामले में पेश होने के लिए उनसे एक साथी वकील ने संपर्क किया। यह याचिका पूर्व डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (DSP) की बेटी ने दायर की। उसने अपने पिता की मौत की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की। हितों के टकराव (Conflict of Interest) के कारण साथी वकील वकालतनामा पर हस्ताक्षर करने में हिचकिचा रहे थे। इसलिए अपीलकर्ताओं ने नेक नीयत से अनुरोध स्वीकार कर लिया।

वकालतनामा पर हस्ताक्षर करने से पहले वकीलों ने मामले की सच्चाई और बेटी के अस्तित्व के बारे में खुद संतुष्ट किया कि वह कोई काल्पनिक व्यक्ति नहीं है। वकालतनामा पर हस्ताक्षर करते समय बेटी हाई कोर्ट परिसर में मौजूद है। साथ ही बेटी के साथ एक और मुवक्किल भी था, जो कई सालों से उस साथी वकील के संपर्क में है।

इसके अलावा, ओथ कमिश्नर (शपथ आयुक्त) के सामने रजिस्टर्ड क्लर्क ने बेटी की पहचान की। हालांकि, रिट याचिका लगभग छह साल तक लंबित रही।

याचिका के लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी संख्या 6, 7 और 8, जिन पर DSP के गायब होने और मौत का कारण बनने का संदेह था, कोर्ट पहुंचे। उन्होंने कोर्ट के सामने आरोप लगाया कि बेटी एक काल्पनिक व्यक्ति है। एक CID जांच शुरू की गई जिसमें रिपोर्ट दी गई कि बेटी उसके दिए गए पते पर नहीं मिल सकी।

सिंगल जज ने बिना किसी आपत्ति के CID रिपोर्ट स्वीकार की। सिंगल जज ने माना कि याचिका एक काल्पनिक व्यक्ति द्वारा दायर की गई। इसलिए रिट याचिका खारिज की गई और प्रत्येक वकील (अपीलकर्ता) पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया गया। इसके अलावा, बार काउंसिल को उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया गया।

इसलिए वकीलों ने सिंगल जज के फैसले को चुनौती देने की तैयारी शुरू की। इसी बीच उन्हें रेस्पॉन्डेंट नंबर 7 द्वारा दायर कैविएट नंबर 84/2016 की एक कॉपी मिली। यह कैविएट मुंसिफ़ कोर्ट नंबर 1 में एक प्रॉपर्टी विवाद के मामले में बेटी के खिलाफ दायर की गई। इसलिए वकीलों ने इस आधार पर रिव्यू पिटीशन दायर की।

हालांकि, रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी गई।

कोर्ट ने माना कि यह दावा कि बेटी कोई काल्पनिक व्यक्ति नहीं थी और असल में उसका अस्तित्व था, केवल अनुमान पर आधारित है। इसलिए कोर्ट को उस पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत नहीं है, जिसमें बेटी के अस्तित्व को नकारा गया।

इससे असंतुष्ट होकर वकीलों ने सिंगल जज के फैसले और रिव्यू पिटीशन में पारित आदेश को गुवाहाटी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी।

वकीलों ने तर्क दिया कि CID की रिपोर्ट, जिसमें कहा गया कि बेटी अपने दिए गए पते पर नहीं मिली, उसका असल में यह मतलब नहीं है कि एक व्यक्ति के तौर पर उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। वकील के रजिस्टर्ड क्लर्क ने हाई कोर्ट कैंपस में उसकी पहचान की। क्लर्क ने CID के सामने बयान दिया कि उसने 2016 में उसे देखा और पहचाना।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि रेस्पॉन्डेंट नंबर 6, 7 और 8 ने गुमराह करने वाला बयान दिया कि बेटी एक काल्पनिक महिला थी, जबकि रेस्पॉन्डेंट नंबर 7 ने असल में मुंसिफ़ कोर्ट नंबर 1 में प्रॉपर्टी विवाद के मामले में उसके खिलाफ कैविएट पिटीशन दायर की थी।

आखिर में यह कहा गया कि रिट पिटीशन दायर करने और उस पर बहस करने के बाद याचिकाकर्ता के शारीरिक रूप से मौजूद होने या न होने के लिए वकीलों को गारंटर नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट की बातें और निष्कर्ष

डिविजन बेंच ने माना कि बेटी के पेश न होने के लिए अपील करने वाले वकीलों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। बेंच ने पाया कि रिट याचिका को सही ढंग से खारिज किया गया, क्योंकि याचिकाकर्ता-बेटी नहीं मिल पाई, लेकिन मामले के तथ्यों और हालात को देखते हुए वकीलों पर पेशेवर के तौर पर जुर्माना लगाना सही नहीं है।

यह भी माना गया कि मामले को बार काउंसिल को भेजना उन वकीलों के साथ सख़्त बर्ताव होगा, जो काफी समय से कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे थे।

इसके अलावा, वकीलों को सलाह दी गई कि वे किसी दोस्त के कहने पर वकालतनामा स्वीकार करने से पहले रिट याचिका की सच्चाई की जांच करके ज़्यादा सावधानी बरतें। साथ ही यह निर्देश दिया गया कि उन्हें खुद तसल्ली कर लेनी चाहिए कि याचिकाकर्ता मुक़दमेबाज़ के तौर पर गलत जानकारी नहीं दे रहा है।

इसलिए डिविजन बेंच ने सिंगल जज द्वारा रिट याचिका खारिज करने का फैसला बरकरार रखा। हालांकि, डिविजन बेंच ने वकीलों पर लगाए गए जुर्माने और मामले को बार काउंसिल को भेजने का आदेश रद्द किया।

इन बातों के साथ डिविजन बेंच ने रिव्यू पिटीशन में सिंगल जज द्वारा पारित आदेश भी रद्द किया। नतीजतन, डिविजन बेंच ने वकीलों द्वारा दायर अपील को मंज़ूरी दी।

Case Title : Harbinder Singh Kalsi & Anr. v. State of Assam & Ors.

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