जस्टिस संजीव नरूला की दिल्ली हाईकोर्ट बेंच ने कहा कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन रूल्स, 1973 के नियम 121 के तहत, मैनेजिंग कमेटी के लिए यह ज़रूरी है कि वह नौकरी पर वापस बुलाए जाने पर पिछली बकाया सैलरी के बारे में सही और निष्पक्ष फैसला ले। वह बिना साबित हुए आरोपों या अनुमानों के आधार पर सैलरी देने से इनकार नहीं कर सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता 'न्यू सरस्वती पब्लिक सेकेंडरी स्कूल' में असिस्टेंट टीचर थे। उनकी नियुक्ति मूल रूप से 15 अक्टूबर 1993 को हुई थी। उनकी सेवाएँ 16 अक्टूबर 2002 और 14 नवंबर 2002 को खत्म कर दी गई थीं। शिक्षा अधिकारी ने 2003 और 2004 में उन्हें वापस नौकरी पर रखने का निर्देश दिया, लेकिन डायरेक्टरेट ने 2004 में नौकरी से हटाने को मंज़ूरी दी। दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल ने 2009 में उनकी अपील खारिज की। इस कोर्ट ने 15 फरवरी 2017 को नौकरी से हटाने के फैसले को गैर-कानूनी बताते हुए रद्द किया। स्कूल की अपील खारिज कर दी गई।

याचिकाकर्ता ड्यूटी पर हाज़िर हुए लेकिन उन्हें जॉइन करने नहीं दिया गया। इसके चलते कोर्ट की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू हुई। आखिरकार अगस्त 2017 में उन्होंने जॉइन किया और स्कूल ने उन्हें 16 अक्टूबर 2002 से वापस नौकरी पर रख लिया। हालांकि, मैनेजिंग कमेटी ने नियम 121 के तहत उनके पिछली बकाया सैलरी का दावा खारिज कर दिया। बाद में स्कूल ने डिवीज़न बेंच द्वारा दी गई छूट के आधार पर अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की। इसके परिणामस्वरूप 2023 में याचिकाकर्ता को नौकरी से हटा दिया गया।

इससे परेशान होकर याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नियम 121 के तहत उनके पिछली बकाया सैलरी के दावे को खारिज करने का आदेश गैर-कानूनी और टिकने लायक नहीं था। यह तर्क दिया गया कि मैनेजिंग कमेटी ने गलत तरीके से यह मान लिया कि याचिकाकर्ता ने कंप्यूटर पोस्ट के लिए नकली सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया और इसे ही उनकी अनुपस्थिति का कारण माना, जबकि इस सवाल पर कोई फैसला नहीं हुआ।

यह भी कहा गया कि वह 16 अक्टूबर 2002 से 10 अगस्त 2017 तक पूरी तरह से बेरोजगार रहे और नौकरी पर वापस बुलाए जाने के तुरंत बाद ड्यूटी पर हाज़िर हुए, लेकिन उन्हें जॉइन करने नहीं दिया गया। आगे यह भी कहा गया कि डिवीज़न बेंच ने उनकी योग्यता का सवाल भविष्य में होने वाली कानूनी जांच के लिए खुला रखा था, और मैनेजिंग कमेटी उनके 'रूल 121' के तहत दिए गए आवेदन पर फैसला करते समय उस जांच के नतीजे का पहले से अंदाज़ा नहीं लगा सकती।

दूसरी ओर, स्कूल की तरफ से यह तर्क दिया गया कि बिना सरकारी मदद वाले प्राइवेट स्कूल के खिलाफ रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती। आगे यह भी कहा गया कि 1993 में असिस्टेंट टीचर के तौर पर उनकी शुरुआती नियुक्ति के लिए ज़रूरी योग्यता उनके पास नहीं थी। स्कूल ने योग्यता की जांच करने और शक होने पर जाली दस्तावेजों की छानबीन करने के एम्प्लॉयर के अधिकार के समर्थन में 'रुचिका राय मदान बनाम डायरेक्टरेट ऑफ़ एजुकेशन' मामले का हवाला दिया।

यह तर्क भी दिया गया कि याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति कंप्यूटर पोस्ट के लिए नकली सर्टिफिकेट इस्तेमाल करने के उनके अपने आचरण की वजह से थी। इसी आधार पर मैनेजिंग कमेटी का बकाया वेतन का दावा खारिज करना सही था।

कोर्ट की बातें और निष्कर्ष

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का 'रूल 121' के तहत दिया गया आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उन्होंने कंप्यूटर पोस्ट के लिए नकली सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने यह भी देखा कि डिवीज़न बेंच ने कानून के अनुसार जांच के लिए असिस्टेंट टीचर के तौर पर याचिकाकर्ता की योग्यता का सवाल साफ़ तौर पर खुला रखा था। इसलिए 'रूल 121' के तहत आवेदन पर फैसला करते समय मैनेजिंग कमेटी यह नहीं मान सकती थी कि वह सवाल पहले ही उनके खिलाफ तय हो चुका है।

आगे यह भी देखा गया कि स्कूल के पिछले आदेश में यह माना गया कि अगर उनके कंप्यूटर सर्टिफिकेट में कोई दिक्कत न होती तो याचिकाकर्ता असिस्टेंट टीचर के तौर पर काम करते रहते। इसलिए स्कूल अब यह दावा नहीं कर सकता कि असिस्टेंट टीचर के तौर पर उनकी शुरुआती नियुक्ति गलत थी।

कोर्ट ने आगे कहा कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन रूल्स, 1973 के नियम 121 के तहत मैनेजिंग कमिटी को बकाया वेतन (back wages) के बारे में ठोस आधार पर फैसला लेना ज़रूरी है। साथ ही नियम का प्रावधान वेतन में कटौती की इजाज़त तभी देता है जब देरी सीधे तौर पर कर्मचारी की वजह से हुई हो। ऐसा करने से पहले कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया हो और कटौती के कारण लिखित रूप में दर्ज किए गए हों।

कोर्ट ने सुनील सिकरी बनाम गुरु हरकिशन पब्लिक स्कूल मामले का हवाला दिया, जिसमें यह तय हुआ कि नियम 121 के तहत मिली शक्ति "कर्तव्य के साथ जुड़ी शक्ति" है, जिसका इस्तेमाल सभी ज़रूरी बातों पर विचार करने के बाद निष्पक्ष रूप से किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता नौकरी से बाहर रहा और बहाली का आदेश मिलने पर काम पर लौट आया, जबकि स्कूल की ओर से उसके कहीं और नौकरी करने या कमाई करने का कोई सबूत पेश नहीं किया गया।

कोर्ट ने राम बहादुर पांडे बनाम उत्तराखंड राज्य मामले को इस मामले से अलग माना। कोर्ट ने गौर किया कि उस मामले में नियुक्ति में गड़बड़ी का मुद्दा पहले से ही कोर्ट के सामने था, जबकि इस मामले में डिवीज़न बेंच ने यह सवाल खुला छोड़ दिया।

कोर्ट ने माना कि नियम 121(2) के तहत पूरी तरह दोषमुक्त (Exoneration) होने की बात साबित नहीं हुई, लेकिन बिना साबित हुई गलती के आधार पर बकाया वेतन पूरी तरह से न देना भी उतना ही गलत था। इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 16 अक्टूबर 2002 से 14 फरवरी 2017 की अवधि के लिए बकाया वेतन और देय भत्तों का 50% भुगतान किया जाए, जिसमें वेतन में काल्पनिक बढ़ोतरी (Notional Progression) भी शामिल हो। कोर्ट ने 5 अगस्त 2017 का आदेश रद्द किया।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका को मंज़ूरी दी।

Case Name : Rajinder Kumar Gupta v. The Chief Secretary, Government of NCT Delhi and Ors.

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