एम्प्लॉयर के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को ट्वीट करना सर्विस रूल्स के तहत मिसकंडक्ट माना जा सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि किसी के एम्प्लॉयर के खिलाफ करप्शन के आरोपों को ट्वीट करना या पब्लिक में फैलाना लागू सर्विस रूल्स के तहत मिसकंडक्ट माना जा सकता है।
जस्टिस संजीव नरूला ने कहा,
“याचिकाकर्ता ने ट्वीट्स और री-ट्वीट्स के ज़रिए ऑर्गनाइज़ेशन के खिलाफ आरोपों को पब्लिक में बढ़ाया, इंटरनल फ्रेमवर्क से बाहर रिप्रेजेंटेशन दिए, और पाया गया कि उसने बाहरी दबाव बनाने की कोशिश की। ऐसा कंडक्ट कंडक्ट, डिसिप्लिन और अपील रूल्स, 1976 के तहत डिसिप्लिनरी कार्रवाई का कारण बन सकता है। इसके लिए सीरियस एक्शन की ज़रूरत है।”
कोर्ट एक पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) के एम्प्लॉई की रिट पिटीशन पर विचार कर रहा था, जिसमें ऑर्गनाइज़ेशन के अंदर करप्शन का आरोप लगाने वाले ट्वीट्स पोस्ट करने के लिए उसके खिलाफ शुरू की गई डिसिप्लिनरी कार्रवाई को चैलेंज किया गया।
डिसिप्लिनरी अथॉरिटी ने एम्प्लॉई को मिसकंडक्ट का दोषी पाया था और सर्विस से हटाने की सज़ा दी थी।
गलत व्यवहार के नतीजों को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सर्विस कंडक्ट नियमों के तहत आने वाले कर्मचारी अनुशासन के एक फ्रेमवर्क से बंधे होते हैं। हालांकि उन्हें बोलने की आज़ादी के उनके बुनियादी अधिकार से वंचित नहीं किया जाता, लेकिन ऐसा अधिकार सर्विस कानून में मौजूद उचित पाबंदियों के अधीन है।
कोर्ट ने कहा,
“अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात कहना आर्टिकल 19(1)(a) और (b) के तहत आ सकता है, लेकिन यह भी माना जाता है कि उचित पाबंदियां, खासकर सर्विस में बोलने के तरीके को रेगुलेट कर सकती हैं। पब्लिक सेक्टर के कर्मचारी के बोलने के अधिकार खत्म नहीं होते हैं, बल्कि उन्हें कंडक्ट नियमों के ज़रिए नियंत्रित किया जाता है, जो अनुशासन, संस्थागत सही व्यवहार और एम्प्लॉयर के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार से बचने पर ज़ोर देते हैं।”
साथ ही कोर्ट ने माना कि सर्विस से हटाने की सज़ा साबित हुए गलत व्यवहार के नेचर के हिसाब से ज़्यादा थी।
कोर्ट ने कहा,
“जहां नौकरी से निकालने की बहुत बड़ी सज़ा दी जाती है तो उम्मीद की जा सकती है कि ऑर्डर में कुछ सोच-समझकर बताया गया होगा कि ऐसा कदम क्यों ज़रूरी माना गया और छोटी सज़ा को इंस्टीट्यूशनल डिसिप्लिन बनाए रखने के लिए काफ़ी क्यों माना गया। 35. जिन ऑर्डर पर सवाल उठाए गए, उनमें सज़ा पर तर्क देने में ऐसी सोच-समझकर की गई कोशिश नहीं दिखती।”
इसलिए कोर्ट ने डिसिप्लिनरी कार्रवाई में दर्ज दोष के नतीजों को सही ठहराया, लेकिन एम्प्लॉयर को सज़ा की मात्रा पर फिर से सोचने का निर्देश दिया।
Case title: Madanjit Kumar v. Central Electronics Limited