दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि किसी मामले को किसी अन्य न्यायालय में ट्रांसफर करने का आदेश न्यायिक अधिकारी के जीवन भर के करियर को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए ऐसा कदम आमतौर पर नहीं उठाया जाना चाहिए।

जस्टिस सी हरि शंकर ने कहा कि किसी मामले को उस न्यायालय से बाहर ट्रांसफर करना, जो उसकी सुनवाई कर रहा है और जिसके पास सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र है, अत्यंत गंभीर मामला है।

अदालत ने कहा,

"यह ऐसा कदम है, जिसका आमतौर पर सहारा नहीं लिया जाना चाहिए। यह मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश की निष्पक्षता और कभी-कभी ईमानदारी पर भी संदेह पैदा करता है।"

इसमें कहा गया कि केवल तभी जब ठोस और स्पष्ट सामग्री रिकॉर्ड में रखी गई हो, जो यह इंगित करती हो कि मामले की सुनवाई करने वाला न्यायाधीश पक्षपाती या पक्षपाती है या उस अदालत में कार्यवाही जारी रखने से दोनों पक्षों में से किसी के साथ स्पष्ट अन्याय होने वाला है, तब अदालत मामले को उस अदालत से बाहर स्थानांतरित कर सकती है।

अदालत ने कहा,

"ऐसे ट्रांसफर का एक भी आदेश कभी-कभी संबंधित न्यायिक अधिकारी के जीवन भर के करियर को बर्बाद कर सकता है।"

जस्टिस शंकर ने कमर्शियल अदालत के जिला न्यायाधीश के समक्ष लंबित मुकदमे को उसी जिले की किसी अन्य कमर्शियल अदालत में ट्रांसफर करने की मांग करने वाली याचिका को 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं।

अदालत ने कहा,

"यह याचिका कुछ मामलों में वादियों द्वारा अपनाई गई घातक प्रथा का उदाहरण है, जो सौभाग्य से बहुत कम हैं- जिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (सीपीसी) की धारा 241 द्वारा हाइकोर्ट को दिए गए अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करके उन अदालतों से मामलों को ट्रांसफर करने की कोशिश की जाती है, जो उनसे निपटने में सक्षम हैं केवल इस कारण से कि संबंधित अदालत द्वारा पारित आदेश वादी को स्वीकार्य नहीं हैं।"

अदालत ने कहा,

वादी द्वारा दिए गए किसी भी आधार से वाणिज्यिक अदालत के बाहर मुकदमे को स्थानांतरित करने का मामला नहीं बनता है, जो वर्तमान में उसके अधीन है। वर्तमान जैसे आवेदन प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं। कोई वादी किसी ऐसे न्यायालय के समक्ष मामले पर बहस नहीं कर सकता है, जो उसके अनुसार सबसे सुविधाजनक है। अदालत द्वारा पारित प्रत्येक आदेश जो वादी को स्वीकार्य नहीं है, वह अदालत से बचने और मामले पर कहीं और बहस करने का आधार नहीं बन सकता है। इस तरह की प्रथा की जोरदार निंदा की जानी चाहिए।"

इसमें आगे कहा गया,

"यह तब और भी अधिक सच है जब विचाराधीन मुकदमा कमर्शियल मुकदमा है। यह सर्वविदित है कि कमर्शियल मुकदमे में सभी बाधाओं को दूर कर दिया जाता है और वादी कार्यवाही की उचित निरंतरता को प्रभावित करने के लिए हर संभव तरीके का सहारा लेता है।"

केस टाइटल- संजय गोयल बनाम मैजेस्टिक बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड

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