गिरफ्तारी के लिखित कारणों पर सुप्रीम कोर्ट का 'मिहिर राजेश शाह' फैसला भविष्य में लागू होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-01-28 05:36 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जिसमें सभी अपराधों में रिमांड से पहले आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित कारण देना अनिवार्य है, भविष्य में लागू होगा और इसे फैसले की तारीख से पहले की गई गिरफ्तारियों पर लागू नहीं किया जा सकता।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस मनोज जैन की डिवीजन बेंच ने इस तरह एक याचिका खारिज की, जिसमें एक हत्या के मामले में याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई कि गिरफ्तारी के समय उसे गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं दिए गए।

याचिकाकर्ता को 7 फरवरी, 2024 को IPC की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास) और 34 के तहत दर्ज FIR के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उसने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) का पालन न करने के कारण उसकी गिरफ्तारी असंवैधानिक है।

उसने पंकज बंसल, प्रबीर पुरकायस्थ, विहान कुमार और मिहिर राजेश शाह सहित सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि गिरफ्तारी के लिखित कारण न देने से गिरफ्तारी अवैध हो जाती है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि मिहिर राजेश शाह का फैसला 6 नवंबर, 2025 को याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के काफी बाद सुनाया गया। इसलिए इसे पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।

बेंच ने कहा कि गिरफ्तारी के लिखित कारण देने की एक समान आवश्यकता, जैसा कि मिहिर राजेश शाह मामले में तय किया गया, 'अब से' गिरफ्तारियों पर लागू होगी।

कोर्ट ने कहा,

"मिहिर राजेश शाह (उपरोक्त) में तय किया गया कानून, जहां तक ​​यह गिरफ्तारी के कारणों की एक समान लिखित सूचना को अनिवार्य करता है, भविष्य में लागू होगा।"

कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता को शुरू से ही अपनी गिरफ्तारी के आधार के बारे में स्पष्ट रूप से पता था, उसे उस समय की स्पष्ट जानकारी थी, क्योंकि अभियोजन पक्ष का मामला रिमांड के कागजात में बताया गया और हर चरण में उसका प्रतिनिधित्व वकील कर रहे थे, जिसमें रिमांड की कार्यवाही भी शामिल थी, जहां पुलिस हिरासत का गुण-दोष के आधार पर विरोध किया गया।

स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम श्री दर्शन (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने "पूर्वाग्रह-उन्मुख परीक्षण" लागू किया। बेंच ने कहा कि सिर्फ लिखित आधारों की गैर-मौजूदगी अपने आप गिरफ्तारी को गैर-कानूनी नहीं बनाती, जब तक कि इससे आरोपी को अपना बचाव करने का उचित मौका न मिले और "साफ तौर पर नुकसान" न हो।

किसी भी साफ नुकसान की गैर-मौजूदगी और शिकायत उठाने में एक साल नौ महीने से ज़्यादा की देरी का हवाला देते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

Case title: Karan Singh v. State

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