दिल्ली हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़े एक अहम फैसले में कहा कि किसी सीनियर सिटीजन को अपनी बहू के खिलाफ घर खाली कराने की कार्रवाई शुरू करने के लिए पहले भरण-पोषण की मांग करना जरूरी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और उनकी संपत्ति से बेटे, बेटी या कानूनी उत्तराधिकारी को बेदखल करने की कार्यवाही अलग-अलग हैं।

चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि दिल्ली माता-पिता और सीनियर सिटीजन का भरण-पोषण एवं कल्याण नियम, 2009 के नियम 22(3)(1) के तहत बेदखली की कार्रवाई स्वतंत्र रूप से की जा सकती है। इसके लिए वरिष्ठ नागरिक को वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत भरण-पोषण का दावा करना अनिवार्य नहीं है।

खंडपीठ ने कहा कि नियम 22(3)(1)(i) और (iv) में वरिष्ठ नागरिकों को दी गई बेदखली की व्यवस्था वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के खिलाफ नहीं है। अदालत के अनुसार, इन नियमों का आधार केवल राज्य सरकार को मिले नियम बनाने के अधिकार में नहीं है, बल्कि सीनियर सिटीजन एक्ट की धारा 22 में भी है। इस धारा के तहत सीनियर सिटीजन के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाने का प्रावधान है।

अदालत ने कहा,

“ये दोनों कार्यवाहियां एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं। इसलिए यदि सीनियर सिटीजन एक्ट की धारा 4 के साथ धारा 5 के तहत भरण-पोषण की मांग नहीं की गई, तब भी 2009 के नियमों के नियम 22(3)(1) के तहत आवेदन किया जा सकता है।”

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक बहू की याचिका खारिज करते हुए की। बहू ने मंडलायुक्त के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी सास की संपत्ति खाली कर शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने का निर्देश दिया गया।

याचिका में बहू ने नियम 22(3)(1)(i) और (iv) की वैधता को भी चुनौती दी थी। इन प्रावधानों के तहत सीनियर सिटीजन या माता-पिता संपत्ति से बेटे, बेटी या कानूनी उत्तराधिकारी को भरण-पोषण न करने या दुर्व्यवहार करने की स्थिति में बाहर करने की मांग कर सकते हैं।

बहू की ओर से दलील दी गई कि इन प्रावधानों में बेटे, बेटी और कानूनी उत्तराधिकारी का उल्लेख है, इसलिए इन्हें बहू पर लागू नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया।

खंडपीठ ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत किसी राहत के लिए पहले उत्पीड़न, दुर्व्यवहार और भरण-पोषण न करने की स्थिति साबित करना जरूरी है और ऐसी स्थिति में केवल भरण-पोषण की राहत दी जा सकती है, संपत्ति से बेदखली की नहीं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण से संबंधित मामले सीनियर सिटीजन एक्ट की धारा 4 और 5 के तहत धारा 7 के अंतर्गत गठित अधिकरण के सामने चलाए जाते हैं। वहीं, नियम 22(3)(1) के तहत संपत्ति से बेदखली की कार्यवाही जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष शुरू होती है और इसके खिलाफ अपील मंडलायुक्त के पास की जा सकती है।

खंडपीठ ने कहा कि दोनों कार्यवाहियों का स्वरूप और मंच अलग है। इसलिए एक कार्यवाही के लिए दूसरी कार्यवाही शुरू करना अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने सीनियर सिटीजन एक्ट की धारा 22(2) का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि इस प्रावधान में राज्य सरकार से सीनियर सिटीजन के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाने की स्पष्ट अपेक्षा की गई। अदालत के अनुसार, विवादित नियम बनाने की शक्ति केवल अधिनियम की धारा 32 से नहीं आती, बल्कि धारा 22(2) भी इन नियमों का आधार है।

इन आधारों पर अदालत ने नियम 22(3)(1)(i) और (iv) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। साथ ही, अदालत ने मंडलायुक्त के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से भी इनकार कर दिया, जिसके तहत बहू को सीनियर सिटीजन सास की संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया गया।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने साफ किया कि सीनियर सिटीजन की संपत्ति की सुरक्षा के लिए उपलब्ध बेदखली की व्यवस्था केवल भरण-पोषण की कार्यवाही पर निर्भर नहीं है। यदि नियमों के तहत आवश्यक परिस्थितियां मौजूद हों, तो वरिष्ठ नागरिक संपत्ति से बेटे, बेटी या कानूनी उत्तराधिकारी को हटाने की कार्रवाई के लिए अलग से आवेदन कर सकता है।

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