बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाना पॉलिसी से जुड़ा फ़ैसला, कोर्ट इस पर निर्देश नहीं दे सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार किया। इस याचिका में 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से रोकने और 13 से 16 साल के बच्चों के लिए कंटेंट को रेगुलेट करने के लिए गाइडलाइंस बनाने या कानून लाने की मांग की गई।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने का मामला केंद्र सरकार का पॉलिसी से जुड़ा फ़ैसला है और कोर्ट ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकता।
कोर्ट ने कहा,
"उनकी राय ली जानी चाहिए और फिर यह पॉलिसी के दायरे में आता है... कोर्ट का काम यह निर्देश देना नहीं है कि आप इसे बैन करें या उसे बैन करें... उन्हें इस पर विचार करने दें और फिर आदेश जारी करने दें।"
याचिका में 16 साल और उससे कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने, साथ ही उम्र की अनिवार्य जांच और रात के समय कर्फ्यू लगाने की मांग की गई।
यह याचिका तीन साल के बच्चे की मां कीर्ति दुआ और बच्चों के डॉक्टर (पीडियाट्रिशियन) डॉ. शरद गुप्ता ने दायर की।
सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित या रेगुलेट करने का मामला पॉलिसी से जुड़ा फ़ैसला है, जिस पर सरकार को विचार करना है।
यह भी कहा गया कि ऐसी पॉलिसी के व्यापक असर होंगे और इसके लिए स्टेकहोल्डर्स (संबंधित पक्षों) से बातचीत की भी ज़रूरत होगी।
केंद्र के वकील ने सुझाव दिया कि याचिका को एक 'रिप्रेजेंटेशन' (प्रस्ताव) के तौर पर विचार करने का निर्देश दिया जा सकता है और फिर उचित आदेश पारित किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि वह सरकार को बाध्य नहीं कर सकता, क्योंकि यह पॉलिसी से जुड़ा फ़ैसला है, और केंद्र इस मामले पर विचार करके उचित फ़ैसला लेगा।
हालांकि, फ़ैसला लेने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई। याचिका के अनुसार, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइन्स और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 और POCSO Act के बावजूद, मौजूदा कानूनों को ठीक से लागू न करने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा सुरक्षा के अपर्याप्त उपाय अपनाने के कारण बच्चों के लिए हानिकारक कंटेंट आसानी से उपलब्ध है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सोशल मीडिया तक बिना रोक-टोक पहुंच के कारण बच्चों में डिजिटल लत बढ़ रही है, जिससे उनकी मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिकारियों द्वारा ऐसे प्लेटफॉर्म को ठीक से रेगुलेट न कर पाना भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है और नाबालिग बच्चों की सुरक्षा के लिए राज्य की ज़िम्मेदारी के भी खिलाफ है।
PIL में केंद्र सरकार से गाइडलाइन्स और नियम बनाने और 16 साल या उससे कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर हानिकारक कंटेंट देखने से रोकने के लिए केंद्रीय कानून बनाने पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई।
इसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि वे यूज़र्स को अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की इजाज़त देने से पहले उम्र की पुष्टि करने वाले मज़बूत सिस्टम लागू करें और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी नीतियों को सख्ती से लागू करें।
याचिका में कहा गया,
"इसलिए भारत को सख्त गाइडलाइन्स, नियमों और कानूनी रूप से बाध्यकारी कानून (जो इन कमियों को दूर करे और किसी भी उल्लंघन के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जवाबदेह बनाए) पर विचार करने की ज़रूरत है।"
Title: KIRTI DUA & ANR v. UNION OF INDIA & ORS