पासपोर्ट फीस बढ़ोतरी को चुनौती: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से तीन महीने में फैसला लेने को कहा
दिल्ली हाईकोर्ट ने पासपोर्ट शुल्क में बढ़ोतरी को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका को ही विदेश मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत अभ्यावेदन माना जाए और कानून के अनुसार इस पर शीघ्र, अधिमानतः तीन महीने के भीतर फैसला लिया जाए।
चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने यह निर्देश प्रवासी लीगल सेल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
याचिका में पासपोर्ट (संशोधन) नियम 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। इन नियमों के तहत एक जुलाई 2026 से विभिन्न श्रेणियों में पासपोर्ट शुल्क में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से मौखिक रूप से कहा,
"आज की महंगाई की दर को देखते हुए क्या आपको यह शुल्क अत्यधिक लगता है आप अपनी बात संबंधित मंत्रालय के समक्ष रखें। विदेश मंत्रालय इस पर निर्णय लेगा।"
इसके बाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिका को अभ्यावेदन के रूप में स्वीकार कर कानून के अनुरूप आवश्यक निर्णय ले और अपने फैसले की जानकारी याचिकाकर्ता को दे। इसके साथ ही याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
याचिका में कहा गया कि संशोधित शुल्क संरचना मनमानी, असंगत और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 21 का उल्लंघन करती है। बढ़े हुए शुल्क से देश के लाखों नागरिकों, विशेषकर अनिवासी भारतीयों, प्रवासी कामगारों और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।
याचिका के अनुसार विदेश में रहने वाले भारतीयों से कई श्रेणियों में उसी प्रकार की वैधानिक सेवा के लिए भारत में रहने वाले नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक शुल्क लिया जा रहा है।
उदाहरण के तौर पर 36 पृष्ठों वाले सामान्य पासपोर्ट का शुल्क भारत में रहने वाले नागरिकों के लिए 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये किया गया, जबकि विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए यह शुल्क 75 अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 125 अमेरिकी डॉलर कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि पासपोर्ट कोई वैकल्पिक दस्तावेज नहीं बल्कि रोजगार, निवास, वीजा नवीनीकरण, वाणिज्य दूतावास संबंधी सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए आवश्यक वैधानिक दस्तावेज है।
ऐसे में शुल्क में भारी बढ़ोतरी का सबसे अधिक असर खाड़ी देशों और अन्य विदेशी देशों में कार्यरत प्रवासी श्रमिकों पर पड़ेगा, जो अपने परिवारों के भरण-पोषण के लिए विदेश में काम करते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि प्रवासी लीगल सेल ने 27 जून और उसके केरल प्रकोष्ठ ने 6 जुलाई को विदेश मंत्रालय को शुल्क संरचना पर पुनर्विचार के लिए अभ्यावेदन दिया लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।