लिखित समझौते में दर्ज नहीं रकम का दावा केवल बाद के बयान से नहीं जोड़ा जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के सामने दर्ज किए गए अंतिम समझौते में शामिल नहीं की गई किसी अतिरिक्त रकम के भुगतान का दावा केवल बाद में किए गए मौखिक दावे के आधार पर समझौते का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए धोखाधड़ी, बहकावे या सहमति को प्रभावित करने वाली किसी अन्य परिस्थिति का स्पष्ट और ठोस प्रमाण जरूरी है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने संपत्ति विवाद में तीन प्रतिवादियों की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अपीलकर्ताओं ने निचली अदालत की ओर से पारित सहमति डिक्री को रद्द करने की मांग की थी।
मामले में पक्षकारों के बीच मुकदमे की सुनवाई के दौरान समझौता हुआ। 26 सितंबर 2022 को तीनों अपीलकर्ता अपने वकील के साथ निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और शपथपूर्वक संयुक्त बयान दिया।
समझौते के तहत अपीलकर्ताओं ने स्वीकार किया कि संपत्ति पर उनका या उनके कानूनी उत्तराधिकारियों का कोई अधिकार, स्वामित्व या हित नहीं है। उन्होंने अपने कब्जे वाला हिस्सा शांतिपूर्वक खाली कर उसकी चाबियां भी सौंप दीं। इसके बदले प्रतिवादियों ने कुल 40 लाख रुपये के तीन डिमांड ड्राफ्ट दिए।
पक्षकारों ने स्पष्ट रूप से 40 लाख रुपये को “पूर्ण और अंतिम समझौता” माना और यह भी कहा कि संपत्ति को लेकर आगे कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा नहीं किया जाएगा। ट्रायल कोर्ट ने यह भी पूछा था कि क्या सभी पक्षकार समझौते की शर्तों को समझते हैं, जिस पर उन्होंने सहमति जताई।
बाद में अपीलकर्ताओं ने दावा किया कि उन्होंने संपत्ति में अपने कथित अधिकार केवल इस आश्वासन पर छोड़े थे कि संपत्ति बिकने के बाद उन्हें अतिरिक्त तीन करोड़ रुपये दिए जाएंगे। उन्होंने 5-5 लाख रुपये के दो भविष्य की तारीख वाले चेक पर भी भरोसा किया और आरोप लगाया कि झूठे आश्वासन और गलत प्रस्तुतीकरण के जरिए उनकी सहमति ली गई।
अपीलकर्ताओं ने दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के तहत सहमति डिक्री रद्द करने का आवेदन दिया। निचली अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि समझौते में 40 लाख रुपये को स्पष्ट रूप से पूर्ण और अंतिम भुगतान बताया गया है और अतिरिक्त रकम या उसके किसी आश्वासन का कोई उल्लेख नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि समझौता न तो अस्पष्ट था और न ही अधूरा या अनिश्चित। 40 लाख रुपये की रकम स्पष्ट रूप से तय थी। इसके साथ ही अपीलकर्ताओं ने संपत्ति का कब्जा और चाबियां सौंप दी थीं तथा यह भी स्वीकार किया कि संपत्ति पर उनका कोई अधिकार, स्वामित्व या हित नहीं है।
अदालत ने कहा कि तीन करोड़ रुपये का कथित अतिरिक्त भुगतान कोई मामूली या अलग शर्त नहीं थी। खुद अपीलकर्ताओं के अनुसार यही रकम उन्हें संपत्ति का कब्जा छोड़ने और अपने दावे समाप्त करने के लिए तैयार करने वाली मुख्य शर्त थी।
पीठ ने कहा कि यदि तीन करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान वास्तव में समझौते का अभिन्न हिस्सा होता और इसी के आधार पर अपीलकर्ताओं ने संपत्ति का कब्जा छोड़ा होता, तो निचली अदालत के सामने दर्ज समझौते में उसका स्पष्ट उल्लेख होना स्वाभाविक था।
हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता धोखाधड़ी, बहकावे, अनुचित प्रभाव या ऐसी किसी अन्य परिस्थिति को साबित करने में विफल रहे, जिससे समझौते को अमान्य या रद्द करने योग्य माना जा सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में किए गए ऐसे कथित मौखिक आश्वासन उस समझौते की जगह नहीं ले सकते, उसे बदल नहीं सकते और न ही उसकी शर्तों को बढ़ा सकते हैं, जिसे पक्षकारों ने अदालत के सामने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था और जिस पर अमल भी किया गया।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए सहमति डिक्री रद्द करने से ट्रायल कोर्ट का इनकार बरकरार रखा।