सिर्फ़ वीज़ा होने से किसी विदेशी को भारत में घुसने का बिना शर्त अधिकार नहीं मिलता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ वीज़ा होने से किसी विदेशी नागरिक को भारत में घुसने का बिना शर्त और पक्का अधिकार नहीं मिल जाता।
जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि वीज़ा जारी करना, एंट्री से मना करना या इमिग्रेशन मंज़ूरी देना सरकार का एक संप्रभु काम है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और प्रशासनिक विवेक जैसे पहलुओं पर आधारित होता है।
कोर्ट ने कहा,
"कानूनी व्यवस्था के तहत इमिग्रेशन अधिकारी एंट्री के समय विदेशी के पासपोर्ट, यात्रा दस्तावेज़ और वीज़ा की जांच करते हैं। उन्हें ज़रूरी और उचित जानकारी मांगने का अधिकार होता है। इसलिए, कानूनी ढांचा वीज़ा होने को भारत में एंट्री का पक्का और बिना शर्त अधिकार नहीं मानता है।"
कोर्ट ने यह बात तुर्कमेनिस्तान की एक विदेशी नागरिक की याचिका खारिज करते हुए कही। उसने अधिकारियों से भारत में एंट्री से मना करने के कारणों को बताते हुए "लिखित आदेश" (Written Speaking Order) जारी करने का निर्देश देने की मांग की।
उसने अपने बिज़नेस वीज़ा के आधार पर भारत में एंट्री की मंज़ूरी भी मांगी।
उसका कहना था कि उसे बिना कोई कारण बताए एंट्री से मना कर दिया गया, जबकि उसके पति को एंट्री मिल गई थी, जो भेदभावपूर्ण व्यवहार को दिखाता है।
अधिकारियों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि किसी विदेशी नागरिक के पास सिर्फ़ वैध वीज़ा होने के आधार पर भारत के क्षेत्र में घुसने का कोई पक्का या न छीना जा सकने वाला अधिकार नहीं होता है।
यह भी तर्क दिया गया कि वीज़ा देना और भारत में एंट्री की मंज़ूरी देना अलग-अलग बातें हैं। बाद वाली बात इमिग्रेशन से जुड़े कानूनों और सक्षम अधिकारियों के अधिकारों के अधीन होती है।
याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के माता-पिता और जीवनसाथी के विवरण में विसंगति थी और यात्रा के उद्देश्य के संबंध में उसके पास कोई बिज़नेस कार्ड या कोई निमंत्रण पत्र नहीं था और वह अपने देश में अपने व्यवसाय से संबंधित विवरण देने में भी विफल रही है।
कोर्ट ने कहा,
"इस तरह सभी हालात और पेश किए गए सबूतों को देखते हुए याचिकाकर्ता का दावा खारिज होना तय है, क्योंकि किसी विदेशी नागरिक का भारत में प्रवेश पाने का कोई जन्मजात या कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं है।"
कोर्ट ने फिर से कहा कि भारत में किसी विदेशी नागरिक का प्रवेश सरकार के खिलाफ लागू करने योग्य अधिकार का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की अपनी मर्जी (संप्रभु अधिकार) का मामला है।
जज ने कहा,
"न्यायिक समीक्षा के तहत किसी विदेशी नागरिक के प्रवेश से जुड़े मामले में सक्षम अधिकारी के फैसले की जगह अपना फैसला लेना इस कोर्ट का काम नहीं है, खासकर तब जब यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी गोपनीय जानकारी पर विचार करने के बाद लिया गया हो।"
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
"....किसी विदेशी नागरिक का भारत में प्रवेश पाने का कोई जन्मजात या कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं है। यह एक स्थापित बात है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब किसी अधिकार का उल्लंघन हुआ हो। जब कोई अधिकार ही नहीं है तो कोई रिट जारी नहीं की जा सकती।"
Case Title : ANNAGURBANOVA YAZBIBI HUMMETGULYYEVNA & ANR v. UNION OF INDIA & ANR