नीरव मोदी और बैंक ऑफ इंडिया विवाद: ब्रिटिश अदालत के अनुरोध पर गवाह के बयान दर्ज करेगा दिल्ली हाइकोर्ट

Update: 2026-01-19 06:36 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने ऐतिहासिक मिसाल पेश करते हुए इंग्लैंड और वेल्स के सुप्रीम कोर्ट (किंग्स बेंच डिवीजन) के उस अनुरोध पर कार्रवाई शुरू की, जिसमें भगोड़े हीरा व्यापारी नीरव मोदी और बैंक ऑफ इंडिया के बीच चल रहे एक कानूनी मामले में भारत में मौजूद गवाह के बयान दर्ज करने की मांग की गई। यह मामला बैंक ऑफ इंडिया द्वारा नीरव मोदी पर लगाए गए कर्ज न चुकाने के आरोपों से जुड़ा है।

जस्टिस सी. हरि शंकर की पीठ इस विषय पर सुनवाई कर रही है, जहां ब्रिटिश अदालत ने बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारी अनिमेष बरुआ का साक्ष्य दर्ज करने का आग्रह किया।

यह पूरी प्रक्रिया नागरिक या वाणिज्यिक मामलों में विदेशों में साक्ष्य लेने से संबंधित 'हेग कन्वेंशन' के तहत संचालित की जा रही है। केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय ने ब्रिटिश अदालत के इस औपचारिक पत्र को हाइकोर्ट के पास भेजा था। हालांकि केंद्र सरकार इस विवाद में सीधे तौर पर कोई पक्षकार नहीं है। फिर भी जस्टिस शंकर ने इस मामले की कानूनी जटिलताओं को देखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) चेतन शर्मा से अदालत की सहायता करने का अनुरोध किया।

अदालत ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि यह संभवतः पहला ऐसा उदाहरण है, जहां कोर्ट किसी विदेशी अदालत के संदेश के आधार पर स्वतः संज्ञान लेकर कार्यवाही कर रहा है, जबकि इस विवाद से जुड़े किसी भी पक्ष ने सीधे हाइकोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया।

इस कानूनी लड़ाई में मुख्य रूप से बैंक ऑफ इंडिया, फायरस्टार डायमंड एफजेडई, फायरस्टार इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड और नीरव मोदी शामिल हैं। हाइकोर्ट ने इन सभी पक्षों को नोटिस जारी कर दिया। नीरव मोदी को यह नोटिस ब्रिटेन स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास के माध्यम से भेजा जाएगा।

जस्टिस शंकर ने एएसजी और उनके सहयोगियों से इस मुद्दे की गहराई से जांच करने और भविष्य की कार्ययोजना पर सुझाव देने को कहा है ताकि साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया को अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुरूप सही ढंग से पूरा किया जा सके।

अदालत अब इस बात पर विचार करेगी कि गवाह के बयान किस प्रकार और किस माध्यम से दर्ज किए जाएं ताकि उन्हें ब्रिटिश अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। इस कार्यवाही को भारत और ब्रिटेन के बीच न्यायिक सहयोग की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय अपराधों और भगोड़े अपराधियों से जुड़े मामलों में साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना सकता है।

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