अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सोशल मीडिया पर मानहानि या दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाने का लाइसेंस नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि बोलने की आज़ादी महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह आज़ादी की आड़ में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मानहानिकारक, अपमानजनक या दुर्भावनापूर्ण सामग्री प्रकाशित करने तक नहीं फैली हुई है।
जस्टिस ज्योति सिंह ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल दूसरों के अधिकारों को कुचलने के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर प्रतिष्ठा के अधिकार को, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग माना जाने वाला एक मूल्यवान अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि बोलने की आज़ादी के अधिकार को प्रतिष्ठा और गरिमा के अधिकार के साथ संतुलित करना संवैधानिक व्यवस्था का एक आंतरिक हिस्सा है।
यह आदेश ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म फिजिक्सवाला के खिलाफ एक पूर्व कर्मचारी निखिल कुमार सिंह द्वारा किए गए अपमानजनक और आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने या नीचे उतारने का निर्देश देते हुए पारित किया गया।
कोर्ट ने एक अंतरिम निषेधाज्ञा पारित की और कहा कि ऑनलाइन सामग्री जो प्रथम दृष्टया मानहानिकारक और अपमानजनक है, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में संरक्षित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए निषेधाज्ञा राहत की आवश्यकता है।
यह तब हुआ जब सिंह के वकील ने विवादित वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के प्रकाशन और प्रसार का बचाव करने के लिए 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की ढाल ली।
इस पर कोर्ट ने कहा कि हालांकि बोलने की आज़ादी एक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है और लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है, लेकिन यह एक पूर्ण, असीमित, अनियंत्रित या बेलगाम अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"हालांकि यह एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है, 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' अनुच्छेद 19(2) के तहत अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त सीमाओं और उचित प्रतिबंधों से घिरी हुई है। इसमें ऐसा भाषण शामिल नहीं है, जो मानहानिकारक, दुर्भावनापूर्ण, अपमानजनक हो या दूसरों की प्रतिष्ठा या गरिमा को नुकसान पहुंचाने के लिए हो और न ही इसे किसी व्यक्ति/संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लाइसेंस के रूप में माना जा सकता है।"
इसमें कहा गया कि ट्रेडमार्क व्यवस्था में कानून मार्क के रजिस्टर्ड मालिक को उल्लंघन से सुरक्षा प्रदान करता है और सद्भावना और प्रतिष्ठा के क्षरण से भी बचाता है, जो मार्क से जुड़ा एक सामान्य कानून अधिकार है।
जस्टिस सिंह ने कहा कि भ्रामक या अपमानजनक बयानों के माध्यम से अपमान करना दूसरे पक्ष की व्यावसायिक सद्भावना में एक गैरकानूनी हस्तक्षेप है और कानून में इसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
"सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके अपमानजनक कंटेंट फैलाने से नुकसान और बढ़ जाता है, क्योंकि डिजिटल पब्लिकेशन की स्पीड, पहुंच और परमानेंस बहुत ज़्यादा होती है। इससे ट्रेडमार्क की रेप्युटेशन के साथ-साथ प्रभावित पार्टी की गुडविल को भी तुरंत और ऐसा नुकसान हो सकता है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती, जिसे सालों की कड़ी मेहनत और इन्वेस्टमेंट से बनाया जाता है।"
कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि सिंह द्वारा पब्लिश किए गए विवादित पोस्ट और वीडियो का कंटेंट पहली नज़र में मानहानिकारक, अपमानजनक है। इसका मकसद फिजिक्सवाला की गुडविल को खराब करना और उसके ब्रांड को बदनाम करना है, जिसे सही कॉम्पिटिशन या सुरक्षित कमर्शियल कंटेंट नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"कोर्ट ने लगातार यह माना है कि ट्रेडमार्क को बदनाम करने के मामलों में गुडविल को खराब होने और कंज्यूमर को गुमराह होने से रोकने के लिए रोक लगाना ज़रूरी है।"
Title: PHYSICSWALLAH LIMITED v. NIKHIL KUMAR SINGH AND ORS