दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी मेडिकल डिग्री के वेरिफिकेशन की अनिवार्यता को बरकरार रखते हुए कहा है कि विदेशी मेडिकल योग्यता का प्रमाणीकरण जरूरी है ताकि फर्जी या गलत शैक्षणिक योग्यता के आधार पर कोई उम्मीदवार विदेशी मेडिकल स्नातक परीक्षा यानी FMGE में शामिल न हो सके।

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने विदेशों से मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले भारतीय नागरिकों की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने FMGE में शामिल होने की अनुमति नहीं दिए जाने को चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ताओं ने स्क्रीनिंग टेस्ट विनियम, 2002 के विनियम 4(1) को चुनौती दी थी। इस प्रावधान के तहत विदेशी मेडिकल योग्यता की पुष्टि संबंधित भारतीय दूतावास से कराना जरूरी है। दूतावास को यह पुष्टि करनी होती है कि संबंधित योग्यता उस देश में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए पंजीकरण के लिहाज से मान्य है जहां संबंधित संस्थान स्थित है।

याचिकाकर्ताओं ने FMGE की सूचना पुस्तिका के खंड 2.14 को भी चुनौती दी थी। इसके तहत विदेशी मेडिकल डिग्री का भारतीय दूतावास से सत्यापन या संबंधित विदेशी देश के सक्षम प्राधिकारी से प्रमाणन कराना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि सूचना पुस्तिका में विदेशी मेडिकल डिग्री के सत्यापन की शर्त स्क्रीनिंग विनियम, 2002 के विनियम 4(1) के अनुरूप है और यह विनियम वैधानिक प्रकृति का है।

कोर्ट ने कहा कि विदेशी मेडिकल डिग्री का दूतावास से सत्यापन या सक्षम प्राधिकारी से प्रमाणन उस योग्यता की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया है। इसलिए किसी उम्मीदवार को इससे कोई वास्तविक नुकसान नहीं होता।

अदालत ने कहा,

“किसी उम्मीदवार द्वारा अपनी पात्रता के आधार के रूप में प्रस्तुत दस्तावेज का सत्यापन जरूरी है, ताकि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था उन उम्मीदवारों को परीक्षा में शामिल होने से रोक सके, जो फर्जी या गलत शैक्षणिक योग्यता के आधार पर परीक्षा में बैठना चाहते हैं।”

हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी देश में भारतीय दूतावास से वेरिफिकेशन या 5 अक्टूबर 1961 के हेग कन्वेंशन के अनुरूप विदेशी मेडिकल डिग्री का प्रमाणन किसी उम्मीदवार के लिए अनुचित बाधा नहीं है। इसलिए सूचना पुस्तिका में इस शर्त को चुनौती देने का कोई आधार नहीं बनता।

खंडपीठ ने स्क्रीनिंग विनियम, 2002 के विनियम 4(1) को चुनौती देने से भी इनकार किया। अदालत ने कहा कि भारतीय दूतावास द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं किए गए विदेशी मेडिकल संस्थानों को बाहर रखने का फैसला प्रासंगिक तथ्यों और विशेषज्ञ राय पर आधारित है।

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल शिक्षा को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार विशेषज्ञ संस्था यदि अपने अनुभव और विशेषज्ञ राय के आधार पर कोई व्यवस्था तय करती है तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा में अदालत आम तौर पर उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक कि वह व्यवस्था पूरी तरह मनमानी न हो।

अदालत ने कहा कि विदेशी मेडिकल संस्थानों को विनियम के दायरे से बाहर रखने का फैसला मेडिकल शिक्षा के नियमन में संबंधित संस्था के अनुभव और प्रासंगिक परिस्थितियों पर आधारित दिखाई देता है। इसलिए विशेषज्ञ राय के आधार पर बनाए गए इस प्रावधान में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

इस तरह दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी मेडिकल डिग्री के सत्यापन को FMGE में शामिल होने की पात्रता से जुड़ी वैध और आवश्यक शर्त माना तथा याचिकाकर्ताओं की चुनौती खारिज की।

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