दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कोई पक्षकार अपने वकील की दलीलों के आधार पर पास किए गए आदेश से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने की इजाज़त देने से "अराजक स्थिति" पैदा होगी।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड नाम की कंपनी की याचिका खारिज करते हुए की। कंपनी ने लोक अदालत के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें कथित समझौते के आधार पर चेक बाउंस की शिकायत का निपटारा (कंपाउंडिंग) किया गया।

बैंक ने प्राइवेट प्रतिवादियों को 14.5 लाख रुपये का लोन दिया। जब उधार लेने वाले बकाया रकम चुकाने में नाकाम रहे तो बैंक ने पोस्ट-डेटेड चेक पेश किया, जो बाउंस हो गया। इसके बाद बैंक ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 और 142 के तहत शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत पर सुनवाई के दौरान, 8 अगस्त 2024 को बैंक के वकील ने मजिस्ट्रेट को बताया कि मामला सुलझा लिया गया और बैंक को चेक की रकम का पूरा और अंतिम भुगतान मिल गया। इसके बाद मामले को नेशनल लोक अदालत में भेज दिया गया।

14 सितंबर 2024 को लोक अदालत के सामने बैंक के वकील ने फिर कहा कि मामला सुलझ गया और बैंक की संतुष्टि के अनुसार पूरा भुगतान मिल गया। इसके बाद NI Act की धारा 147 के तहत समझौते (कंपाउंडिंग) के आधार पर शिकायत का निपटारा कर दिया गया और प्रतिवादियों को बरी कर दिया गया।

हालांकि, एक साल से ज़्यादा समय बाद बैंक ने शिकायत को फिर से शुरू करने की मांग की। बैंक का दावा था कि असल में कोई समझौता या भुगतान नहीं हुआ और उसके पूर्व वकील के बयान भ्रम और बैंक के निर्देशों को गलत समझने का नतीजा थे।

बैंक ने यह भी दावा किया कि वकील के बयान बिना अधिकार के दिए गए और बैंक ने कभी उनकी पुष्टि नहीं की।

इस दलील को खारिज करते हुए जस्टिस बनर्जी ने कहा कि समझौते के बारे में बयान सिर्फ़ एक बार नहीं दिया गया। यह बात 8 अगस्त, 2024 को मजिस्ट्रेट के सामने बैंक के वकील ने कही थी और 14 सितंबर, 2024 को लोक अदालत में इसे फिर से दोहराया गया। दोनों ही मौकों पर वकील का अलग से बयान दर्ज किया गया।

कोर्ट ने कहा कि इन बयानों को इस तरह "दो अदालतों की मंज़ूरी" मिल गई।

कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि बैंक ने अधिकार न होने का मुद्दा लगभग 13 महीने बाद तब उठाया, जब उसने शिकायत को फिर से शुरू करने की अर्ज़ी दी। वकील पर कथित गलत व्यवहार का आरोप लगाने के बावजूद, बैंक का प्रतिनिधित्व उसी वकील ने किया और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू नहीं की।

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि वकील बैंक द्वारा विधिवत नियुक्त एडवोकेट है और उसके पास वैध वकालतनामा है।

कोर्ट ने कहा,

"नियुक्त वकील कोर्ट का एक अधिकारी है, न कि याचिकाकर्ता का कोई महज यांत्रिक एजेंट।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंक ने अपने वकील से इस बारे में कोई स्पष्टीकरण भी नहीं मांगा कि दोनों मंचों पर क्या हुआ है।

इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक मजिस्ट्रेट और लोक अदालत के सामने हुई कार्यवाही से "बच नहीं सकता" और उसके बाद की दलीलों को "बाद में सोचा गया विचार" (after-thought) बताया।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"याचिकाकर्ता जैसे किसी भी पक्षकार को वकील की दलीलों के आधार पर पारित आदेशों से पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों को ऐसा तरीका अपनाने की अनुमति देने से "अराजक स्थिति" पैदा होगी और कहा कि बैंक को "दोबारा मौका" (Second bite at the cherry) पाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने आगे कहा कि निर्देश, अधिकार या पुष्टि की कमी के आधार पर अपने वकील के बयान से इनकार करने की बैंक की कोशिश टिकने लायक नहीं थी और यह "एडवोकेट-क्लाइंट संबंध की नींव पर ही प्रहार करती है और न्यायिक प्रक्रिया में कोर्ट की सहायता करने में वकील की भूमिका की पवित्रता को कमज़ोर करती है।"

Case title: Equitas Small Finance Bank Ltd. v. Mrs Nirmala Bai Shanthilal & Ors.

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