बिना बच्चों वाली विधवा को दोबारा शादी के बाद भी फैमिली पेंशन मिलते रहने वाला नियम उचित: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1972 के नियम 54 की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया, जिसके तहत बिना बच्चों वाली विधवा को दोबारा शादी के बाद भी फैमिली पेंशन मिलती रहेगी।
जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने एक मृत CRPF जवान के माता-पिता द्वारा दायर एक रिट याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की विधवा की दोबारा शादी के बाद खुद को फैमिली पेंशन देने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1972 के नियम 54 के तहत बिना बच्चों वाली विधवा दोबारा शादी के बाद भी फैमिली पेंशन पाने की हकदार है।
बेंच ने नियम 54 के साथ-साथ सितंबर, 2008 के ऑफिस मेमोरेंडम के क्लॉज 8.6 की वैधता को भी सही ठहराया, जो आय की शर्तों के अधीन दोबारा शादी के बाद भी बिना बच्चों वाली विधवा को फैमिली पेंशन जारी रखने की अनुमति देता है।
कोर्ट ने कहा,
"ये प्रावधान स्पष्ट रूप से एक स्पष्ट विधायी और कार्यकारी नीति को दर्शाते हैं, जिसका उद्देश्य एक अनुशासित बल के मृत सदस्य की विधवा को दोबारा शादी के बाद भी वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है, इस शर्त के साथ कि उसकी स्वतंत्र आय निर्धारित सीमा से अधिक न हो।"
इसमें आगे कहा गया,
"इस प्रावधान का उद्देश्य विधवाओं को दोबारा शादी के लिए प्रोत्साहित करना है। साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों के सदस्यों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक कल्याण के हित में किए गए बलिदान से उनके आश्रित आर्थिक रूप से कमजोर न हों। ऐसा उद्देश्य न केवल वैध है बल्कि सराहनीय भी है, और नियमों के तहत किए गए वर्गीकरण के साथ इसका सीधा और तर्कसंगत संबंध है।"
मृतक सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) का एक कांस्टेबल था, जिसकी 2014 में जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के दौरान बचाव अभियान चलाते समय मौत हो गई। उसकी मौत के बाद उसकी विधवा के पक्ष में फैमिली पेंशन मंजूर की गई।
उसकी दोबारा शादी के बाद माता-पिता ने विधवा की पेंशन बंद करने की मांग की और खुद को यह तर्क देते हुए हकदार बताया कि दोबारा शादी करने वाली विधवा को पेंशन जारी रखना मनमाना और असंवैधानिक है।
याचिका खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि माता-पिता यह साबित करने में विफल रहे कि नियम 54 किसी भी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करता है या यह संवैधानिक अर्थों में स्पष्ट रूप से मनमाना है। इसमें कहा गया कि सिर्फ़ इसलिए कि कोई अलग व्याख्या या पॉलिसी का विकल्प संभव लग सकता है, यह किसी कानूनी प्रावधान को रद्द करने का आधार नहीं बनता, जो अन्यथा संवैधानिक जांच को पूरा करता है।
कोर्ट ने कहा,
"यह नियम मृत सरकारी कर्मचारी की विधवा या विधुर को प्राथमिकता देता है। मृत कर्मचारी के माता-पिता कैटेगरी-II के लाभार्थियों में आते हैं और उनका अधिकार केवल उन्हीं स्थितियों में बनता है जो नियम में साफ़ तौर पर बताई गईं।"
कोर्ट ने कहा,
"याचिकाकर्ता मृत कर्मचारी के माता-पिता होने के नाते एक योग्य विधवा की मौजूदगी में फैमिली पेंशन देने के लिए नियम 54 के तहत बताई गई शर्तों को पूरा नहीं करते हैं और नियमों के बाहर उनके पक्ष में कोई निहित या तरजीही अधिकार नहीं माना जा सकता है।"
Title: SMT. LAKSHMI DEVI AND ANR v. UNION OF INDIA AND ORS