दिल्ली जल बोर्ड में ठेके पर काम कर रहे करीब 2 हजार सीवर कर्मचारियों को नियमित करने और उन्हें पिछली अवधि का वेतन व सभी वैधानिक लाभ देने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई।

याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने बुधवार को दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड से जवाब मांगा।

मामले की अगली सुनवाई 28 नवंबर को होगी।

याचिका दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच की ओर से दायर की गई। इसमें सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जान गंवाने वाले प्रत्येक कर्मचारी के परिवार को कम से कम एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने और मृतक कर्मचारी के एक योग्य आश्रित को स्थायी सरकारी नौकरी देने की भी मांग की गई।

याचिका में कहा गया कि सीवर की सफाई और रखरखाव दिल्ली जल बोर्ड के स्थायी और वैधानिक सार्वजनिक कार्य हैं। इसलिए ऐसे काम को इस तरह ठेके पर नहीं दिया जा सकता, जिससे कर्मचारियों को नियमित रोजगार से मिलने वाली नौकरी की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों से वंचित होना पड़े।

याचिकाकर्ता के अनुसार, इन कर्मचारियों में समाज के सबसे वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं। इसके बावजूद उन्हें पूरी तरह ठेके या दैनिक आधार पर काम कराया जा रहा है।

याचिका में आरोप लगाया गया कि उन्हें निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान किया जाता है और भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा, ग्रेच्युटी तथा बोनस जैसे वैधानिक लाभ भी नहीं दिए जाते।

याचिका में दावा किया गया कि कर्मचारियों के शोषण और कथित गैरकानूनी व्यवस्था का सिलसिला कम से कम वर्ष 2010 से जारी है और यह व्यवस्था खुले तौर पर चल रही है।

याचिकाकर्ता ने दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड के उच्च स्तर के अधिकारियों पर भी स्थिति की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया।

याचिका में सीवर कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों का भी उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया कि जहरीली गैसों और खतरनाक रसायनों के लगातार संपर्क में रहने से कर्मचारियों को लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

याचिका के मुताबिक हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी जहरीली गैसों और अन्य हानिकारक पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से लगातार सिरदर्द, चक्कर, याददाश्त कमजोर होना, एकाग्रता में कमी, तंत्रिका संबंधी परेशानी, कंपकंपी, शरीर की गतिविधियों पर नियंत्रण में कमी और लंबे समय तक रहने वाले तंत्रिका संबंधी विकार हो सकते हैं।

याचिका में मांग की गई कि सीवर या सेप्टिक टैंक कर्मचारियों की मौत अथवा गंभीर चोट के प्रत्येक मामले में हाथ से मैला ढोने वाले रोजगार के निषेध और उनके पुनर्वास संबंधी कानून, 2013 के तहत तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने सीवर और सेप्टिक टैंक से जुड़े काम नियमित और स्थायी कर्मचारियों के अलावा किसी अन्य श्रमिक से कराने की व्यवस्था पर रोक लगाने की मांग की। याचिका अधिवक्ता उमेश कुमार के माध्यम से दायर की गई।

हाईकोर्ट ने फिलहाल दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

मामले की सुनवाई 28 नवंबर को होगी।

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