शादी टूटने या पति के छोड़ने भर से दोबारा सक्रिय नहीं हो सकती रद्द की गई दुष्कर्म FIR : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि समझौते और बाद में हुई शादी के आधार पर रद्द की गई दुष्कर्म की FIR को केवल इस वजह से दोबारा बहाल नहीं किया जा सकता कि बाद में वैवाहिक संबंध टूट गए या पति ने पत्नी को छोड़ दिया।
जस्टिस अमित महाजन की एकलपीठ ने कहा कि FIR रद्द होने के बाद उत्पन्न वैवाहिक विवाद या आरोप अपने आप में उस न्यायिक आदेश को अमान्य नहीं बना सकते, जो अंतिम रूप ले चुका हो।
अदालत ने कहा,
“यदि बाद में उत्पन्न हर वैवाहिक विवाद, शादी टूटने या आरोपों के आधार पर समाप्त आपराधिक कार्यवाही को फिर से जीवित करने की अनुमति दे दी जाए तो समझौते और सुलह के आधार पर पारित कोई भी आदेश कभी अंतिम नहीं हो सकेगा।”
अदालत ने उस महिला की अर्जी खारिज कर दी जिसमें उसने अपने पति के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म मामले की FIR रद्द करने वाले पुराने आदेश को वापस लेने की मांग की थी।
महिला ने वर्ष 2024 में शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन), 313 और 506 के तहत FIR दर्ज कराई थी।
बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। इसके बाद महिला ने स्वयं अदालत में उपस्थित होकर कहा था कि संबंध सहमति से बने थे और गलतफहमियां उस समय पैदा हुई थीं, जब आरोपी ने शुरुआत में शादी से इनकार किया था। महिला ने यह भी कहा था कि शादी के बाद वह पति के साथ खुशहाल जीवन बिता रही है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR रद्द की थी।
हालांकि लगभग छह महीने बाद महिला फिर अदालत पहुंची और कहा कि आरोपी ने केवल आपराधिक मुकदमे से बचने के लिए शादी की थी। उसने आरोप लगाया कि FIR रद्द होने के बाद उसके साथ क्रूरता, मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और परित्याग किया गया।
इन दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार अदालत अंतिम आदेश पारित कर देती है तो वह उस मामले की दोबारा समीक्षा करने का अधिकार नहीं रखती।
महिला की ओर से कहा गया कि धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश कानून की नजर में वैध नहीं माना जा सकता।
इस पर अदालत ने कहा कि FIR रद्द करने का आदेश केवल पति के कथित बयान पर आधारित नहीं था, बल्कि उस समय महिला द्वारा अदालत में स्वेच्छा से दिए गए बयानों पर भी आधारित था।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“बाद में संबंध खराब होना, शादी निभाने में असफलता या रिश्ता टूट जाना अपने आप में सहमति से बने संबंध को दुष्कर्म में नहीं बदल सकता।”
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि महिला चाहे तो बाद में हुई कथित क्रूरता या अन्य आरोपों के संबंध में अलग से कानूनी उपाय अपना सकती है।