रिजर्व सूची में पहला स्थान पदोन्नति का अधिकार नहीं, रिक्तियां होने पर भी बैंक पर सूची लागू करने की बाध्यता नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति की रिजर्व सूची में पहले स्थान पर होना अपने आप में कर्मचारी को पदोन्नति का कानूनी अधिकार नहीं देता। केवल सूची की वैधता अवधि के दौरान रिक्तियां पैदा होने से संबंधित कर्मचारी पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता।
जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि रिजर्व सूची में कर्मचारी का पहला स्थान तभी उसे प्राथमिकता देता है, जब बैंक उस सूची को लागू करने का निर्णय ले। हालांकि, बैंक के लिए रिजर्व सूची को लागू करना अनिवार्य नहीं है।
कोर्ट बैंक ऑफ बड़ौदा के एक पूर्व उप-महाप्रबंधक की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता ने 1 दिसंबर 2016 से महाप्रबंधक के पद पर पदोन्नति देने और उससे जुड़े लाभ प्रदान करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता वर्ष 1978 में बैंक में शामिल हुए और मई 2014 में उप महाप्रबंधक के पद पर पदोन्नत हुए। मई 2016 में बैंक ने महाप्रबंधक पद पर पदोन्नति के लिए प्रक्रिया आयोजित की। इसमें तीन अधिकारियों को सफल घोषित किया गया, जबकि 15 अन्य अधिकारियों को 31 मार्च 2017 तक सामने आने वाली भविष्य की रिक्तियों के लिए प्रतीक्षा सूची में रखा गया। यह सतर्कता मंजूरी के अधीन था। इसके अलावा तीन अधिकारियों की रिजर्व सूची तैयार की गई, जिसमें याचिकाकर्ता पहले स्थान पर थे। यह सूची 1 अप्रैल 2017 तक वैध थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बाद में महाप्रबंधक संवर्ग में कई रिक्तियां हुईं। इनमें एक रिक्ति 1 दिसंबर 2016 को एक अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के कारण हुई थी। रिजर्व सूची में पहले स्थान पर होने के आधार पर उन्होंने दावा किया कि उन्हें उसी रिक्ति के विरुद्ध 1 दिसंबर 2016 से पदोन्नत किया जाना चाहिए।
उन्होंने बैंक में पहले के उन मामलों का भी हवाला दिया, जिनमें रिजर्व सूची में शामिल अधिकारियों को अतिरिक्त रिक्तियों के विरुद्ध पदोन्नति दी गई। उनका तर्क था कि इन मामलों के आधार पर उन्हें भी इसी तरह की पदोन्नति मिलने की वैध अपेक्षा थी।
बैंक ने कहा कि रिजर्व सूची में शामिल होने से पदोन्नति का कोई अधिकार पैदा नहीं होता। बैंक ने अपनी पदोन्नति नीति का हवाला देते हुए कहा कि प्रबंधन उपलब्ध रिक्तियों को खाली रखने का फैसला कर सकता है। साथ ही, रिक्तियां होने पर प्रतीक्षा सूची से पदोन्नति जारी करने का निर्णय सक्षम प्राधिकारी के विवेक पर निर्भर करता है।
हाईकोर्ट ने बैंक की पदोन्नति नीति के खंड 11.8 से 11.10 की जांच की। कोर्ट ने पाया कि खंड 11.8 में प्रबंधन को रिक्तियां उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें खाली रखने की अनुमति है। वहीं, खंड 11.10 में यह प्रावधान है कि रिक्तियां पैदा होने पर सक्षम प्राधिकारी प्रतीक्षा सूची से पदोन्नति जारी कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि बैंक के पास प्रशासनिक विवेक का दायरा मौजूद है। रिजर्व सूची का उद्देश्य पहले से मूल्यांकन किए गए अधिकारियों के समूह में से जरूरत पड़ने पर अधिकारी चुनने की सुविधा देना है। केवल रिक्ति पैदा होने का मतलब यह नहीं है कि उस पद को हर स्थिति में भरना ही होगा।
हाईकोर्ट ने कहा,
“रिक्ति भरने की तैयारी और हर पैदा हुई रिक्ति को भरने की प्रतिबद्धता एक ही बात नहीं है।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के शंकरसन दास बनाम भारत संघ मामले में दिए फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया कि जब तक संबंधित नियमों में अलग प्रावधान न हो, केवल रिक्तियां होने से उन्हें भरना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं हो जाता। चयन सूची में शामिल होना भी केवल रिक्तियां मौजूद होने के आधार पर नियुक्ति का अटल अधिकार नहीं देता।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पूरी रिजर्व सूची को कभी लागू नहीं किया गया और याचिकाकर्ता के बाद सूची में शामिल किसी उम्मीदवार को भी पदोन्नति नहीं दी गई। इसलिए ऐसा कोई मामला नहीं था, जिसमें याचिकाकर्ता से नीचे स्थान वाले उम्मीदवार को उनसे पहले पदोन्नति दी गई हो।
याचिकाकर्ता ने महाप्रबंधक संवर्ग में 46 पदों की प्रस्तावित संख्या का भी हवाला दिया। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही 46 पदों को संबंधित संवर्ग की संख्या माना जाए, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर समय सभी पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति बनी रहनी चाहिए।
इन परिस्थितियों में दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।