वायरल वीडियो प्रकरण: परिवीक्षाधीन DHJS जज की सेवा समाप्ति बरकरार, दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा- कार्रवाई न दंडात्मक, न ही कलंककारी
दिल्ली हाइकोर्ट ने वायरल कोर्टरूम वीडियो के बाद दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा (DHJS) के परिवीक्षाधीन न्यायिक अधिकारी की सेवा समाप्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। हाइकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कार्रवाई अधिकारी की समग्र अनुपयुक्तता के आकलन पर आधारित साधारण सेवा समाप्ति है और इसे न तो दंडात्मक कहा जा सकता है और न ही कलंककारी।
जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने 10 अक्टूबर, 2024 की अधिसूचना और 14 अक्टूबर, 2024 के परिणामी आदेश को वैध ठहराया, जिनके माध्यम से परिवीक्षा पर कार्यरत एक अतिरिक्त जिला जज की सेवाएं दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा नियम, 1970 के नियम 14 के तहत समाप्त की गईं।
हाइकोर्ट ने कहा,
“सेवा समाप्ति साधारण प्रकृति की है। वह न तो दंडात्मक है और न ही कलंककारी। इस पर संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत प्रदत्त सुरक्षा अथवा अनुशासनात्मक कार्यवाही से जुड़े प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू नहीं होते।”
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता की नियुक्ति अप्रैल, 2023 में दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि के लिए डीएचजेएस में हुई थी और वे द्वारका कोर्ट परिसर में अतिरिक्त जिला जज के रूप में कार्यरत थे। 6 सितंबर, 2024 को कोर्ट की कार्यवाही के दौरान वादकारी के साथ हुई कथित तीखी बहस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें उन्हें कथित रूप से नशे की हालत में दर्शाया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वीडियो को जानबूझकर चुनिंदा ढंग से रिकॉर्ड किया गया, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े नियमों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बाद में उनके कोर्टरूम की जांच में कोई आपत्तिजनक या दोषारोपण योग्य सामग्री नहीं पाई गई। उनका दावा था कि उनकी सेवा समाप्ति पूरी तरह इसी वायरल वीडियो की घटना पर आधारित है।
उन्होंने यह भी दलील दी कि बिना किसी विभागीय जांच और बिना सुनवाई का अवसर दिए सेवा समाप्त करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 311(2) का उल्लंघन है।
हाइकोर्ट का आकलन
हाइकोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक परिवीक्षाधीन अधिकारी थे और उन्हें सेवा में बने रहने का कोई वैधानिक या निहित अधिकार प्राप्त नहीं था। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि उनकी सेवा समाप्ति से पहले ही, 29 अगस्त 2024 को उनकी प्रतिकूल वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) दर्ज की जा चुकी थी जो वायरल वीडियो की घटना से भी पूर्व की थी।
कोर्ट ने कहा कि पूर्ण पीठ द्वारा अनुमोदित एसीआर में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि संबंधित अधिकारी को अदालत में अपने व्यवहार में सुधार की आवश्यकता है और कई अवसरों पर वकीलों के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत रूखा पाया गया। इसके अतिरिक्त, उनके न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता को भी “औसत से कम” आंका गया।
खंडपीठ ने टिप्पणी की,
“एसीआर में दर्ज ये टिप्पणियां न्यायिक स्वभाव और निर्णयात्मक गुणवत्ता जैसे मूलभूत गुणों से संबंधित हैं, जो किसी न्यायिक अधिकारी की सेवा में निरंतरता के आकलन के लिए केंद्रीय महत्व रखते हैं।”
अनुपयुक्तता के आधार पर वैध कार्रवाई
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा समाप्ति आदेश में न तो किसी प्रकार की दोषसिद्धि का उल्लेख है और न ही कोई कलंककारी भाषा प्रयुक्त की गई। आदेश को स्पष्ट रूप से परिवीक्षा अवधि के दौरान की गई सेवा समाप्ति के रूप में दर्शाया गया।
खंडपीठ ने कहा,
“रिकॉर्ड से उभरने वाले तथ्यों के आधार पर यह निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति नियम 14 के अंतर्गत हाइकोर्ट की शक्ति का वैध प्रयोग है। यह प्रतिकूल एसीआर उपयुक्तता से जुड़ी शिकायतों और पूर्ण पीठ द्वारा किए गए समग्र मूल्यांकन पर आधारित है। यह कार्रवाई परिवीक्षाधीन अधिकारी की अनुपयुक्तता के आधार पर की गई साधारण सेवा समाप्ति है न कि किसी कदाचार के लिए दंडात्मक हटाना।”
इन टिप्पणियों के साथ दिल्ली हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की और सेवा समाप्ति का आदेश बरकरार रखा।