FIR में नाम न होना निर्णायक नहीं, यदि वित्तीय लेन-देन से संलिप्तता साबित हो: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-02-04 10:49 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच में यह सामने आता है कि आरोपी का मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े अन्य आरोपियों के साथ वित्तीय लेन-देन रहा है, जिससे उसकी सक्रिय भूमिका और समन्वय सिद्ध होता है, तो केवल इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती कि उसका नाम FIR में दर्ज नहीं था।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी गांजा की बड़ी मात्रा में कथित तस्करी से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

आरोपी की दलीलें

आरोपी ने अदालत के समक्ष यह तर्क दिया कि उसका नाम FIR में नहीं है और उसके पास से किसी प्रकार का नशीला पदार्थ बरामद नहीं हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि वह लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है, इसलिए उसे जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।

अदालत का आकलन

अदालत ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि जांच के दौरान सामने आए वित्तीय लेन-देन से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी का सह-आरोपियों के साथ सीधा आर्थिक संबंध था, जो प्रथम दृष्टया मादक पदार्थों की तस्करी में उसकी सक्रिय भागीदारी और आपसी समन्वय को दर्शाता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल प्राथमिकी में नाम न होना जमानत का निर्णायक आधार नहीं हो सकता। जमानत पर विचार करते समय सभी परिस्थितियों का समग्र रूप से मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले में अभी कई गवाहों की गवाही शेष है और एक सह-आरोपी फरार चल रहा है।

इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज की।

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