बुनियादी ढांचे और डॉक्टरों की कमी का हवाला देकर जेरियाट्रिक मेडिसिन को डीएम कोर्स से बाहर नहीं रख सकते: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग को निर्देश दिया कि एमडी जेरियाट्रिक मेडिसिन को डीएम सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में एडमिशन के लिए पात्र फीडर योग्यता के रूप में शामिल करने पर दोबारा विचार किया जाए। अदालत ने कहा कि बुनियादी ढांचे, शिक्षण स्टाफ और मेडिकल सुविधाओं की कमी का हवाला देकर जेरियाट्रिक मेडिसिन में एमडी करने वाले डॉक्टरों को सुपर स्पेशियलिटी की पढ़ाई का अवसर देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने कहा कि अधिकारियों की ओर से एमडी जेरियाट्रिक मेडिसिन की डिग्री रखने वाले डॉक्टरों को डीएम कोर्स में एडमिशन के लिए अयोग्य रखने के जो कारण बताए गए, वे उन्हें आगे की विशेषज्ञ पढ़ाई और अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाने के अवसर से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
मामला एमडी जेरियाट्रिक मेडिसिन की डिग्री रखने वाले कई डॉक्टरों की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि वे वर्ष 2018 से लगातार संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी मांग रखते आ रहे हैं, लेकिन जेरियाट्रिक मेडिसिन को डीएम की विभिन्न सुपर स्पेशियलिटी के लिए पात्र व्यापक विशेषज्ञताओं की सूची में शामिल नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार एम्स की ओर से डीएम कोर्स में एडमिशन के लिए आयोजित होने वाली INI-SS परीक्षा में भी MD जेरियाट्रिक मेडिसिन के उम्मीदवारों को शामिल होने का अवसर नहीं दिया गया।
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने अपने जवाब में कहा कि MD जेरियाट्रिक मेडिसिन को फीडर योग्यता में इसलिए शामिल नहीं किया गया, क्योंकि इस क्षेत्र में आवश्यक बुनियादी ढांचा शिक्षण स्टाफ, मेडिकल कंटेंट और अस्पताल पर्याप्त नहीं हैं। आयोग के अनुसार इन परिस्थितियों में यह योग्यता DM सुपर स्पेशियलिटी कोर्स के लिए उपयुक्त फीडर योग्यता नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग के जवाब में इसके अलावा कोई ठोस कारण सामने नहीं आता। अदालत ने यह भी कहा कि विभागाध्यक्षों की टिप्पणियों से भी यही संकेत मिलता है कि जेरियाट्रिक मेडिसिन का क्षेत्र उन 60 वर्ष से अधिक आयु के मरीजों की जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है, जिनके उपचार के लिए यह विशेषज्ञता है।
अदालत ने इन कारणों को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने कहा कि जेरियाट्रिक मेडिसिन में एमडी करने वाले डॉक्टरों को डीएम सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में शामिल होने और अपना करियर आगे बढ़ाने से रोकने के लिए बताए गए कारण पर्याप्त नहीं हैं।
अदालत ने कहा कि यदि अधिकारियों का मानना है कि विशेषज्ञ देखभाल की जरूरत वाली आबादी के मुकाबले जेरियाट्रिक मेडिसिन के डॉक्टरों की संख्या कम है, तो इसका समाधान इस क्षेत्र में सीटों और डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना होना चाहिए। डॉक्टरों की कमी को उन डॉक्टरों को आगे की विशेषज्ञ पढ़ाई से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, जिन्होंने पहले ही जेरियाट्रिक मेडिसिन में एमडी की डिग्री हासिल कर ली है।
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि एम्स की ओर से भरोसा किए गए दस्तावेज वर्ष 2019 के थे और उन्हें तैयार हुए सात साल से अधिक समय बीत चुका है। अदालत ने कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद पुरानी सामग्री के आधार पर डॉक्टरों को सुपर स्पेशियलिटी कोर्स से बाहर रखना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग को मामले पर दोबारा विचार करने और एमडी जेरियाट्रिक मेडिसिन को डीएम सुपर स्पेशियलिटी कोर्स के लिए पात्र योग्यता में शामिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह प्रक्रिया जल्द पूरी करने को कहा और याचिका का निपटारा किया।
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