जज के खिलाफ FIR की मांग पर हाईकोर्ट का सख्त रुख, याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार

Update: 2026-03-25 10:48 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई, जिसने एक कार्यरत न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कथित जालसाजी के आरोप में FIR दर्ज कराने की मांग की थी।

चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी जज के खिलाफ सीधे अदालत में याचिका दाखिल कर FIR दर्ज नहीं कराई जा सकती।

अदालत ने कहा,

“यदि आप FIR दर्ज कराना चाहते हैं, तो पहले चीफ जस्टिस से प्रशासनिक स्तर पर अनुमति लेनी होगी। यह प्रक्रिया न्यायिक आदेश के जरिए पूरी नहीं हो सकती।”

जस्टिस करिया ने भी स्पष्ट किया कि अनुमति “मुख्य जस्टिस” से ली जाती है, न कि चीफ जस्टिस की पीठ से, और इसके लिए अलग प्रक्रिया निर्धारित है।

याचिकाकर्ता के व्यवहार पर नाराजगी

अदालत ने सुनवाई का वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करने पर भी सख्त आपत्ति जताई।

चीफ जस्टिस ने कहा,

“आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? यह खुली अदालत है, यहां सैकड़ों वकीलों की मौजूदगी में सुनवाई होती है। क्या आपको लगता है कि आपकी बात नहीं सुनी जाएगी?”

अदालत ने चेतावनी देते हुए निर्देश दिया कि इस तरह के वीडियो किसी भी सोशल मीडिया मंच पर साझा न किए जाएं। साथ ही कहा कि यह आचरण न तो याचिकाकर्ता के हित में है और न ही न्यायिक संस्था के।

तथ्य छिपाने पर भी सवाल

राज्य की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि जिस आदेश को जालसाजी बताया जा रहा है, वह पहले ही न्यायिक प्रक्रिया से गुजरकर अंतिम रूप ले चुका है। इस महत्वपूर्ण तथ्य को याचिका में छिपाया गया, जो गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने यह भी कहा कि वीडियो अपलोड करना अदालत के नियमों का उल्लंघन है और यह न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है।

अदालत की टिप्पणी

चीफ जस्टिस ने कहा,

“हम किसी को भी इस तरह असीमित स्वतंत्रता के साथ काम करने की अनुमति नहीं दे सकते। न्यायिक प्रक्रिया के अपने नियम हैं और उनका पालन अनिवार्य है।”

अदालत ने याचिकाकर्ता को संयम बरतने की सलाह देते हुए कहा कि वकील को निष्पक्ष और संतुलित दृष्टिकोण के साथ अदालत में पेश होना चाहिए।

आगे की कार्रवाई

हाइकोर्ट ने राज्य सरकार, दिल्ली पुलिस और हाईकोर्ट प्रशासन को एक सप्ताह के भीतर संबंधित दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश दिया।

मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह तय की गई।

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