दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला से छेड़छाड़ करने और कथित हमले के दौरान उसके पति व बेटे के कपड़े जबरन उतरवाने के आरोपी वकील को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि वकील होना कानून को अपने हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं है।

जस्टिस गिरिश कथपालिया ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आरोपी को अग्रिम जमानत देना समाज में गलत संदेश भेजेगा और कानून के शासन में जनता के विश्वास को कमजोर करेगा। वकील पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध करने का आरोप है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार घटना 2 जनवरी को शिकायतकर्ता के घर के बेसमेंट में चल रहे जिम को लेकर हुए विवाद के बाद हुई। आरोप है कि वकील के पिता जिम का संचालन देख रहे थे और उन्होंने बेसमेंट तथा घर के बाहर की पार्किंग खाली करने से इनकार किया था।

जब शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्य रसोई की अवरुद्ध पाइपलाइन की मरम्मत कराने के लिए बेसमेंट में जाने की कोशिश कर रहे थे तब कथित तौर पर विवाद शुरू हो गया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि आरोपियों ने परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की। वकील और अन्य आरोपियों ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता के पति को घसीटा और पीटा। महिला के साथ मारपीट और छेड़छाड़ की गई, जबकि उसके पति और बेटे के कपड़े जबरन उतरवाए गए।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने घायल व्यक्तियों के बयान मेडिकल रिकॉर्ड और घटना के CCTV फुटेज पर भरोसा किया। कोर्ट ने गौर किया कि शिकायतकर्ता के पति के दाहिने जबड़े की हड्डी टूट गई। आरोप है कि यह चोट जिम में इस्तेमाल होने वाली रॉड से हमला किए जाने के कारण लगी।

शिकायतकर्ता के बेटे को कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र किए जाने से हुए मानसिक आघात का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि हमले को दिखाने वाला CCTV फुटेज कम से कम कहें तो चौंकाने वाला और बर्बर है।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी को तलाशने के बार-बार प्रयासों और गैर-जमानती वारंट तामील न हो पाने के बाद 12 अक्टूबर 2026 को घोषित अपराधी घोषित किया गया। आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसकी अग्रिम जमानत याचिका लंबित होने के कारण मजिस्ट्रेट उसे घोषित अपराधी घोषित नहीं कर सकते। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही पर रोक लगाने वाला कोई आदेश नहीं था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घोषित अपराधी को अग्रिम जमानत देने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हालांकि ऐसी राहत केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है जैसे कि जब कोर्ट प्रथम दृष्टया यह राय बनाए कि आरोपी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले बालमुकुंद सिंह गौतम बनाम मध्य प्रदेश राज्य पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामला इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया कि आरोपी के वकालत के पेशे में होने के कारण उसे अग्रिम जमानत मिलनी चाहिए।

जस्टिस कथपालिया ने कहा,

“निश्चित रूप से, सभी वकील कोर्ट के अधिकारी होने के नाते सम्मान के पात्र हैं। लेकिन इस सिद्धांत को ऐसे वकील तक नहीं बढ़ाया जा सकता जो इतनी खुलेआम और बेखौफ होकर कानून की धज्जियां उड़ाता हो।”

कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की उस दलील पर भी गौर किया कि जिम के अंदर लगे CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग रखने वाला DVR हटा दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि DVR बरामद करने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ की वास्तविक आवश्यकता है। यह भी अग्रिम जमानत देने के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आधार है।

इन परिस्थितियों में अग्रिम जमानत देने के लिए कोई असाधारण आधार नहीं मिलने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने वकील की याचिका खारिज की।

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