मकान मालिक अपनी ज़रूरतों का 'सर्वश्रेष्ठ निर्णायक' जरूर है, लेकिन किरायेदार को बेदखल करने के लिए वास्तविक आवश्यकता का सबूत देना अनिवार्य: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-01-11 06:22 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने दोहराया है कि भले ही आम तौर पर मकान मालिक को अपनी आवश्यकता का “सर्वश्रेष्ठ निर्णायक” माना जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह बिना ठोस सबूत के किरायेदार को बेदखल कर सकता है। किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 के तहत बेदखली मांगते समय मकान मालिक को अपनी वास्तविक और ईमानदार आवश्यकता (बोना फाइड नीड) को प्रमाणित करना आवश्यक होता है।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी उस पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें मकान मालिक ने धारा 14(1)(e) के तहत दायर अपनी बेदखली याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। मकान मालिक ने किराए पर दिए गए परिसर को अपने व्यापार के विस्तार के लिए आवश्यक बताया था।

न्यायालय ने कहा कि मकान मालिक को न केवल अपने व्यापार की वास्तविक जरूरत साबित करनी होती है, बल्कि यह भी दिखाना होता है कि उसके पास कोई अन्य उपयुक्त वैकल्पिक परिसर उपलब्ध नहीं है।

लेकिन रिकॉर्ड देखने पर अदालत ने पाया कि मकान मालिक यह बोझ उठाने में असफल रहा। अदालत ने कहा:

“मकान मालिक ने न तो जीएसटी रजिस्ट्रेशन, आयकर रिटर्न जैसे कोई वैधानिक दस्तावेज प्रस्तुत किए और न ही कोई फोटो या स्टॉक का विवरण दिया, जिससे यह साबित हो सके कि उसे वाकई बड़े स्थान की जरूरत है। जिस व्यापार विस्तार की बात कही गई, उसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय शिव सरूप गुप्ता बनाम डॉ. महेश चंद गुप्ता (1995) का हवाला देते हुए माना कि मकान मालिक अपनी आवश्यकता का सबसे अच्छा निर्णायक होता है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसकी आवश्यकता ईमानदार, वास्तविक और स्वाभाविक होनी चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि मकान मालिक ने यह तक नहीं बताया कि उसी बाजार में स्थित उसके अन्य गोदाम या वैकल्पिक स्थान व्यापार के लिए उपयुक्त क्यों नहीं थे।

इस आधार पर, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और मकान मालिक की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

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