बाइपोलर डिसऑर्डर मात्र से नहीं मिलेगा स्थानांतरण में छूट, बेंचमार्क दिव्यांगता जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय विद्यालय संगठन की एक शिक्षिका के स्थानांतरण को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि केवल बाइपोलर डिसऑर्डर होने से मेडिकल आधार पर छूट नहीं मिल सकती, जब तक कि बेंचमार्क दिव्यांगता का प्रमाण न हो।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज की। अधिकरण ने भी शिक्षिका के दिल्ली से बाबूगढ़ छावनी स्थित केंद्रीय विद्यालय में स्थानांतरण में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
याचिकाकर्ता जो केंद्रीय विद्यालय संगठन में प्राथमिक शिक्षिका हैं, ने दावा किया कि वह बाइपोलर अफेक्टिव डिसऑर्डर से पीड़ित हैं और उन्हें लगातार इलाज तथा परिवार के सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत उन्हें उचित सुविधा नहीं दी गई।
अदालत ने हालांकि पाया कि 30 जून, 2023 की स्थानांतरण नीति के अनुसार मेडिकल आधार केवल विशेष परिस्थितियों में मान्य है, जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक मानसिक दिव्यांगता जैसी शर्त शामिल है।
खंडपीठ ने कहा,
“याचिकाकर्ता ने बाइपोलर डिसऑर्डर के इलाज से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि वह निर्धारित सीमा के अनुरूप बेंचमार्क दिव्यांगता से ग्रस्त हैं।”
अदालत ने माना कि संबंधित अधिकारियों और अधिकरण का यह निष्कर्ष कि मामला मेडिकल दिव्यांगता श्रेणी में नहीं आता, मनमाना या गलत नहीं कहा जा सकता।
उचित सुविधा के तर्क पर अदालत ने कहा कि राज्य को दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए लेकिन इसके लिए संबंधित कानून या नीति के तहत पात्रता का ठोस आधार होना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि स्थानांतरण सेवा का सामान्य हिस्सा है और किसी कर्मचारी को अपनी पसंद के स्थान पर पदस्थापना का अधिकार नहीं होता।
अदालत ने कहा,
“केवल यह तथ्य कि याचिकाकर्ता को उनकी पसंद के स्थान पर नहीं रखा गया अपने आप में स्थानांतरण को अवैध नहीं बनाता।”
इसी के साथ हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की।