समकक्ष असैनिक पद पर पदोन्नति से स्वतः सैन्य रैंक नहीं मिल सकती, सेना के पदोन्नति मानकों का पालन जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-07-20 11:48 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी को समकक्ष असैनिक पद पर पदोन्नति मिलने मात्र से ब्रिगेडियर या मेजर जनरल जैसी स्थायी सैन्य रैंक स्वतः प्राप्त नहीं हो जाती। ऐसी सैन्य पदोन्नति सेना के निर्धारित नियमों, चयन प्रक्रिया और मेडिकल पात्रता सहित सभी मानकों को पूरा करने पर ही दी जा सकती है।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने यह फैसला सशस्त्र बल अधिकरण का आदेश रद्द करते हुए सुनाया, जिसमें अधिकारी को मूल वरिष्ठता और अन्य लाभों के साथ ब्रिगेडियर और मेजर जनरल की स्थायी रैंक देने का निर्देश दिया गया था।

मामले में संबंधित अधिकारी भारतीय सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स में नियुक्त हुए और बाद में उन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग की समूह 'ए' सेवा में स्थायी रूप से प्रतिनियुक्त किया गया। उन्होंने पहले निदेशक और बाद में अतिरिक्त सर्वेक्षक जनरल के पद पर पदोन्नति प्राप्त की। निर्धारित सेवा अवधि पूरी होने के बाद उन्होंने 1989 के सेवा नियमों के आधार पर ब्रिगेडियर और मेजर जनरल की स्थायी सैन्य रैंक दिए जाने का दावा किया।

भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने इस संबंध में सेना मुख्यालय को पत्र भी भेजा, लेकिन सेना ने यह कहते हुए रैंक देने से इनकार किया कि अधिकारी निम्न चिकित्सकीय श्रेणी में हैं और सैन्य पदोन्नति के लिए निर्धारित चिकित्सकीय मानकों को पूरा नहीं करते।

इसके बाद अधिकारी ने सशस्त्र बल अधिकरण का रुख किया, जहां उनके पक्ष में आदेश पारित हुआ। इस आदेश को केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि 1989 के सेवा नियम केवल असैनिक पदों और सैन्य रैंकों के बीच प्रशासनिक समानता स्थापित करते हैं। इन नियमों से सैन्य पदोन्नति का कोई स्वतंत्र अधिकार उत्पन्न नहीं होता और न ही यह सेना के पदोन्नति संबंधी नियमों को निष्प्रभावी करते हैं।

अदालत ने कहा कि प्रशासनिक समानता और स्थायी सैन्य पदोन्नति दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। प्रशासनिक समानता केवल संगठनात्मक उद्देश्यों के लिए होती है, जबकि स्थायी सैन्य रैंक सेना की कमान, जिम्मेदारी और वरिष्ठता व्यवस्था का हिस्सा होती है।

पीठ ने यह भी कहा कि सेना के पदोन्नति नियमों के तहत अधिकारी की समग्र उपयुक्तता का मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें मेडिकल स्थिति भी महत्वपूर्ण पहलू है। यद्यपि निम्न मेडिकल श्रेणी अपने आप में पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, फिर भी अंतिम निर्णय सेना के सक्षम अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि संबंधित अधिकारी वर्ष 1997 बैच के थे, जबकि वर्ष 1994 बैच के अधिकारियों पर ही हाल में मेजर जनरल पद के लिए विचार शुरू हुआ। ऐसे में उनसे सीनियर अधिकारियों से पहले उन्हें स्थायी सैन्य रैंक देना सेना की स्थापित पदोन्नति व्यवस्था को प्रभावित करता।

अदालत ने कहा कि सशस्त्र बल अधिकरण ने यह मान लिया था कि असैनिक पद पर पदोन्नति मिलते ही समकक्ष स्थायी सैन्य रैंक का अधिकार स्वतः मिल जाता है, जबकि यह कानून और सेना के नियमों के अनुरूप नहीं है।

इन्हीं कारणों से दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकरण का आदेश रद्द करते हुए केंद्र सरकार की याचिका स्वीकार की।

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