दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के रिश्ते से जुड़ी पैसे की मांग सिर्फ़ इसलिए दहेज की मांग नहीं रह जाती क्योंकि पैसा निजी इस्तेमाल के बजाय बिज़नेस शुरू करने के लिए मांगा गया।

जस्टिस विमल कुमार यादव ने यह बात दहेज के कारण हुई मौत के मामले में IPC की धारा 304B और 498A के तहत दोषी ठहराए गए दो लोगों की अपील खारिज करते हुए कही।

यह मामला एक महिला की मौत से जुड़ा था, जिसने शादी के लगभग साढ़े चार महीने बाद 10 अप्रैल, 2003 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। IPC की धारा 498A, 304B और 34 के तहत FIR दर्ज की गई थी। बाद में ट्रायल कोर्ट ने परिवार के दो सदस्यों को IPC की धारा 304B और 498A के तहत दोषी ठहराया, जबकि एक अन्य आरोपी को बरी कर दिया।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतका के साथ ₹50,000 दहेज की मांग को लेकर क्रूरता और उत्पीड़न किया गया।

हाईकोर्ट के सामने बचाव पक्ष ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और तर्क दिया कि वे मृतका के रिश्तेदार थे और उनकी बात की पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था।

इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि गवाहों को सिर्फ़ इसलिए "हितबद्ध गवाह" (Interested Witnesses) नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे मृतका के रिश्तेदार हैं। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता और दहेज उत्पीड़न से जुड़े अपराध आम तौर पर ससुराल में होते हैं, जिससे परिवार के सदस्य उन हालात के स्वाभाविक गवाह बन जाते हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने लगातार ₹50,000 नकद की एक खास मांग के बारे में बात की थी।

इस तर्क को खारिज करते हुए कि यह रकम बिज़नेस शुरू करने के लिए मांगी गई थी और इसलिए इसे दहेज नहीं माना जा सकता, कोर्ट ने कहा,

“बिज़नेस शुरू करने से जुड़ी मांग इसे दहेज की परिभाषा से बाहर नहीं करती, क्योंकि शादी के रिश्ते से जुड़ी मांग सिर्फ़ इसलिए दहेज की मांग नहीं रह जाती, क्योंकि इसके लिए बताया गया मकसद 'निजी इस्तेमाल' के बजाय 'बिज़नेस' है।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि IPC की धारा 304B के तहत दहेज देने के किसी पक्के समझौते के सबूत की ज़रूरत नहीं होती। हालांकि इस अपराध के लिए ज़रूरी अन्य कानूनी शर्तों को साबित करना ज़रूरी है। इस तर्क पर कि मरने वाली महिला के शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं थे, कोर्ट ने कहा कि अगर दूसरे सबूतों से क्रूरता या दहेज के लिए परेशान करने की बात साबित होती है, तो शरीर पर चोट के निशान न होने से ही यह साबित नहीं हो जाता कि ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि धारा 304B के तहत "मौत से ठीक पहले" का मतलब कोई तय समय-सीमा नहीं है, बल्कि यह एक सापेक्ष शब्द है। ज़रूरी बात यह है कि दहेज के लिए परेशान करने और मौत के बीच सीधा और स्पष्ट संबंध हो।

अभियोजन पक्ष के मामले को सज़ा बरकरार रखने के लिए पर्याप्त मानते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज की और अपीलकर्ताओं को बाकी सज़ा काटने के लिए सरेंडर करने का निर्देश दिया।

Case title: Naveen Kumar Verma & Anr. v. State

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