62 साल के बाद प्रशासनिक पद पर नहीं रह सकते डॉक्टर, केंद्र सरकार के नियम को दिल्ली हाइकोर्ट की मंज़ूरी
दिल्ली हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2018 में किए गए उस संशोधन को सही ठहराया, जिसके तहत केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा (CHS) और उससे संबद्ध सेवाओं के डॉक्टर 62 वर्ष की आयु के बाद प्रशासनिक पदों पर कार्य नहीं कर सकते।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 62 वर्ष ही डॉक्टरों की सामान्य सेवानिवृत्ति आयु है और 65 वर्ष तक सेवा में बने रहने की अनुमति केवल गैर-प्रशासनिक भूमिकाओं के लिए दी जा सकती है।
जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने सीनियर CHS डॉक्टरों और उनके संघों द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया।
इन याचिकाओं में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें पहले ही इस संशोधन को वैध ठहराया जा चुका था।
हाइकोर्ट ने कहा कि मौलिक नियम 56(बीबी) में किया गया संशोधन उसी नियम की वैधानिक भाषा से सीधे तौर पर निकलता है और यह किसी भी डॉक्टर के नियमित कार्यकाल के भीतर प्राप्त पदोन्नति के अधिकार को समाप्त नहीं करता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह संशोधन किसी तरह की स्पष्ट मनमानी से ग्रस्त नहीं है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,
“11.08.2018 की अधिसूचना जिसके माध्यम से मौलिक नियम 56 के खंड (बीबी) को प्रतिस्थापित किया गया, उसकी वैधता को दी गई चुनौती निराधार है।”
संशोधित नियम के तहत केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा और अन्य निर्दिष्ट मेडिकल सेवाओं से जुड़े डॉक्टरों की रिटायरमेंट आयु 62 वर्ष तय की गई। हालांकि सक्षम प्राधिकारी की शर्तों के अधीन उन्हें 65 वर्ष तक सेवा में बने रहने का विकल्प दिया गया।
यह विस्तार केवल शिक्षण क्लिनिकल कार्य मरीजों की देखभाल, स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन, जनस्वास्थ्य से जुड़े कार्यों और सलाहकार या परामर्शदायी भूमिकाओं तक सीमित है।
नियम में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि 62 वर्ष की आयु के बाद किसी भी प्रशासनिक पद पर बने रहने की अनुमति नहीं होगी। साथ ही संशोधन लागू होने की तारीख से छह माह के भीतर 62 वर्ष की आयु पूरी कर चुके या करने वाले डॉक्टरों को सेवा विस्तार का विकल्प चुनने का सीमित अवसर भी दिया गया।
याचिकाओं को खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि संशोधित नियम 56(बीबी) को समग्र रूप से पढ़ने पर इसमें कोई संदेह नहीं रहता कि 62 वर्ष ही रिटायरमेंट की आयु है और 65 वर्ष तक सेवा में बने रहना एक सशर्त और सीमित व्यवस्था है।
कोर्ट ने कहा कि यह भी साबित नहीं किया गया कि प्रशासनिक पद कोई अलग कैडर है, जो डॉक्टरों के मूल पद से भिन्न हो। संशोधित नियम से डॉक्टरों के मूल पद या रैंक में कोई बदलाव नहीं होता।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया,
“62 वर्ष की आयु के बाद प्रशासनिक पद न संभाल पाने की शर्त को पद में कमी नहीं माना जा सकता। यह सेवा विस्तार के वैकल्पिक और सशर्त प्रावधान से जुड़ी नियामक शर्त है।”
खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 16 का सहारा लेकर प्रशासनिक पदों पर 62 वर्ष के बाद भी बने रहने का अधिकार नहीं मांग सकते। सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर का अधिकार वैधानिक नियमों के विपरीत सेवा जारी रखने के अधिकार तक विस्तारित नहीं होता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 65 वर्ष तक सेवा में बने रहना सामान्य कार्यकाल का विस्तार नहीं है बल्कि यह कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए दी गई सशर्त सेवा है। ऐसे विस्तार के दौरान प्रशासनिक पदों में पदोन्नति की कोई परिकल्पना नहीं की गई और इसे किसी स्थापित पदोन्नति अधिकार से वंचित किया जाना नहीं माना जा सकता।
इसी आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज की।