लंच ब्रेक के दौरान कार्यस्थल पर हुआ हादसा भी नौकरी का हिस्सा, कर्मचारी मुआवजे का हकदार: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-08-01 07:05 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी के साथ कार्यस्थल पर लंच ब्रेक के दौरान दुर्घटना होती है तो उसे भी नौकरी के दौरान हुई दुर्घटना माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि केवल भोजन के लिए लिया गया अस्थायी विराम कर्मचारी और उसके रोजगार के बीच संबंध समाप्त नहीं करता। ऐसे मामलों में कर्मचारी कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मुआवजे का हकदार रहेगा।

जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने यह टिप्पणी नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए की। बीमा कंपनी ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें वर्ष 2010 में दिल्ली के एक निर्माण स्थल पर हादसे में अपना बायां पैर गंवाने वाले एक सुपरवाइजर को 7.86 लाख रुपये मुआवजा और उस पर ब्याज देने का निर्देश दिया गया।

मामले के अनुसार निर्माण स्थल पर मोबाइल क्रेन से ले जाई जा रही लोहे की एक रॉड कर्मचारी पर गिर गई। हादसे में उसका बायां पैर गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे बाद में काटना पड़ा।

बीमा कंपनी ने दलील दी कि दुर्घटना के समय कर्मचारी लंच ब्रेक पर था, इसलिए यह हादसा नौकरी के दौरान या नौकरी के कारण हुई दुर्घटना नहीं माना जा सकता। कंपनी ने यह भी कहा कि वह सुपरवाइजर था, इसलिए कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आता।

हाईकोर्ट ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना कार्यस्थल पर उस समय हुई, जब कर्मचारी अपने रोजगार के संबंध में वहीं मौजूद था। केवल भोजन के लिए लिया गया अस्थायी विराम रोजगार और दुर्घटना के बीच के संबंध को समाप्त नहीं करता।

कोर्ट ने कहा,

"दुर्घटना कार्यस्थल पर हुई और कर्मचारी अपने रोजगार के कारण वहीं मौजूद था। भोजन के लिए लिया गया अस्थायी विराम अपने आप में रोजगार और दुर्घटना के बीच के संबंध को नहीं तोड़ता।"

सुपरवाइजर होने संबंधी दलील पर भी कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी का केवल पदनाम यह तय नहीं करता कि वह अधिनियम के दायरे में आएगा या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि वह वास्तव में किस प्रकार का कार्य कर रहा था।

कोर्ट ने पाया कि बीमा कंपनी यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकी कि संबंधित कर्मचारी प्रबंधकीय या प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रहा था। इसलिए उसे अधिनियम के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त के आदेश को सही ठहराते हुए बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी और घायल कर्मचारी को 7.86 लाख रुपये मुआवजा तथा ब्याज देने का आदेश बरकरार रखा।

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