सेवा में बने रहे दिव्यांग सैनिकों के आश्रितों को प्राथमिकता-द्वितीय का लाभ नहीं: दिल्ली हाइकोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि सैन्य कार्रवाई के दौरान दिव्यांग हुए किंतु सेवा से बाहर नहीं किए गए और पूर्ण कार्यकाल पूरा करने वाले सैनिकों के आश्रितों को रक्षा कोटे में प्राथमिकता-द्वितीय का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे आश्रितों को केवल निम्न श्रेणी की प्राथमिकता में ही माना जाएगा।
जस्टिस विकास महाजन ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकता-द्वितीय श्रेणी केवल उन सैनिकों के आश्रितों के लिए है, जिन्हें सैन्य सेवा से संबंधित दिव्यांगता के कारण चिकित्सीय बोर्ड की प्रक्रिया के बाद सेवा से पृथक कर दिया गया हो।
अदालत ने कहा,
“जो सैनिक कार्रवाई में घायल या दिव्यांग होकर मेडिकल प्रक्रिया के बाद सेवा से पृथक किए गए, उनके आश्रित प्राथमिकता-द्वितीय के पात्र होंगे। किंतु, जो सैनिक दिव्यांगता के बावजूद सेवा में बने रहे, पूर्ण सेवा अवधि पूरी की या स्वेच्छा से समयपूर्व सेवानिवृत्ति ली उनके आश्रित केवल प्राथमिकता-षष्ठम के अंतर्गत ही पात्र माने जाएंगे।”
गौरतलब है कि प्राथमिकता-द्वितीय श्रेणी को उच्च वरीयता प्राप्त होती है और विश्वविद्यालयों तथा विशेष पाठ्यक्रमों में प्रवेश के समय इसे शहीद सैनिकों के आश्रितों के बाद प्रमुख स्थान दिया जाता है।
मामला एक अभ्यर्थी की रिट याचिका से जुड़ा, जिसने रक्षा कोटे के तहत प्रवेश के लिए आवेदन करते हुए स्वयं को प्राथमिकता-द्वितीय श्रेणी में रखने की मांग की थी। उसका दावा था कि उसके पिता सैन्य कार्रवाई के दौरान दिव्यांग हुए। हालांकि वे दिव्यांगता के बावजूद सेवा में बने रहे और सामान्य रूप से रिटायर हुए।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसे प्राथमिकता-द्वितीय का लाभ न देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और यह समान परिस्थितियों वाले सैनिकों के आश्रितों के साथ भेदभाव है।
हाइकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि प्राथमिकता-द्वितीय का उद्देश्य उन परिवारों को अतिरिक्त संरक्षण देना है, जिनके सदस्य दिव्यांगता के कारण समय से पूर्व सेवा से बाहर कर दिए गए और जिन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसके विपरीत जो सैनिक सेवा में बने रहते हैं उन्हें पूर्ण वेतन, पदोन्नति और अन्य लाभ प्राप्त होते रहते हैं।
अदालत ने कहा कि यह वर्गीकरण तर्कसंगत आधार पर किया गया और इसका सीधा संबंध नीति के उद्देश्य से है। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि आरक्षण की प्राथमिकताएं नीतिगत विषय हैं और जब तक वे स्पष्ट रूप से मनमानी या असंवैधानिक न हों, तब तक अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने वर्ष 2018 की रक्षा कोटा नीति को वैध ठहराया और माना कि याचिकाकर्ता को निम्न प्राथमिकता श्रेणी में रखना सही है।