BSF के कॉम्बैट पदों पर तैनात जवान 57 साल की उम्र में रिटायर होंगे, 60 साल की सिविलियन रिटायरमेंट उम्र का दावा नहीं कर सकते - दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल क्षेतर्पाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीज़न बेंच ने फैसला सुनाया कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) में किसी कॉम्बैट पद पर दोबारा नियुक्त किया गया कोई पूर्व सैनिक, जो उस कॉम्बैट कैडर के लाभों का आनंद लेता है, BSF की 57 साल की वैधानिक रिटायरमेंट उम्र के अधीन होगा, न कि सिविलियन पदों पर लागू 60 साल की रिटायरमेंट उम्र के।
पृष्ठभूमि के तथ्य
प्रतिवादी को 31 अगस्त, 1990 को भारतीय वायु सेना से सेवामुक्त कर दिया गया। इसके बाद 13 दिसंबर, 1991 को उसे BSF की एयर विंग में सब-इंस्पेक्टर (जूनियर एयरक्राफ्ट मैकेनिक) के पद पर दोबारा नियुक्त किया गया। 2003 में BSF ने एक आदेश जारी कर उसे 57 साल की उम्र पूरी होने पर रिटायर किया।
इससे व्यथित होकर उसने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का दरवाजा खटखटाया। यह तर्क दिया गया कि उसके द्वारा धारित पद प्रकृति में सिविलियन था, इसलिए वह 60 साल की उम्र में रिटायर होने का हकदार था। न्यायाधिकरण ने उसके आवेदन को स्वीकार कर लिया। यह फैसला सुनाया गया कि BSF में दोबारा नियुक्त किए गए सशस्त्र बलों के जवान, सिविल पदों के संदर्भ में निर्धारित रिटायरमेंट उम्र तक सेवा में बने रहेंगे।
न्यायाधिकरण के फैसले से व्यथित होकर BSF ने दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कीं।
BSF की ओर से यह तर्क दिया गया कि कॉम्बैट पदों पर तैनात जवानों को उनके सिविलियन समकक्षों की तुलना में उच्च वेतनमान और अतिरिक्त भत्ते प्रदान किए जाते हैं। प्रतिवादी को एक कॉम्बैट पद के विरुद्ध नियुक्त किया गया। यह तर्क दिया गया कि जब कोई कर्मचारी किसी कॉम्बैट पद पर सेवा के सभी लाभों का आनंद ले चुका होता है, तो सेवा समाप्त होने पर वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसे रिटायरमेंट की अधिक अनुकूल शर्तें प्राप्त करने के लिए एक गैर-कॉम्बैट कर्मचारी के रूप में माना जाना चाहिए।
यह तर्क दिया गया कि सिविलियन पदों को कॉम्बैट पदों में बदलने को 19.09.1989 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। इसलिए एयर विंग में जूनियर एयरक्राफ्ट मैकेनिक का पद एक कॉम्बैट पद बन गया। प्रतिवादी को उस पद पर नियुक्त किया गया, जिसे 1989 की मंजूरी के बाद स्वीकृत किया गया था। इसलिए ऐसे पदों को सिविलियन पदों के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। नतीजतन, प्रतिवादी को सिविल पदों पर लागू होने वाले रिटायरमेंट लाभों का दावा करने से रोक दिया गया।
आगे यह तर्क दिया गया कि BSF (अधिकारियों की सीनियरिटी, पदोन्नति और सुपरएनुएशन) नियम, 1978 के नियम 12 के तहत कमांडेंट से नीचे के रैंक वाले अधिकारी 57 वर्ष की आयु में रिटायर होते हैं। गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक सर्कुलर के माध्यम से यही नियम फिर से नियुक्त किए गए रक्षा कर्मियों पर भी लागू किया गया।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से यह तर्क दिया गया कि सीमा सुरक्षा बल (एयर विंग, गैर-लड़ाकू समूह सी और डी पद) भर्ती नियम, 1996 में यह प्रावधान था कि BSF में फिर से नियुक्त किए गए सशस्त्र बल कर्मी, सिविल पदों पर लागू होने वाली सुपरएनुएशन की आयु तक सेवा में बने रहेंगे। यह प्रस्तुत किया गया कि प्रतिवादी को 1997 के नियम बनने से पहले ही फिर से नियुक्त कर लिया गया, जिन नियमों ने इन पदों को लड़ाकू (Combatised) पदों के रूप में वर्गीकृत किया था। इसलिए, 1997 के नियम उन पर लागू नहीं होते थे।
न्यायालय के निष्कर्ष और टिप्पणियां
न्यायालय ने यह नोट किया कि 1978 के नियम एक स्पष्ट रेखा खींचते हैं कि कमांडेंट से ऊपर के रैंक वाले अधिकारी 60 वर्ष की आयु में रिटायर होते हैं, जबकि अन्य रैंक वाले अधिकारी 57 वर्ष की आयु में रिटायर होते हैं। यह देखा गया कि यह स्पष्ट अंतर मनमाना नहीं था, बल्कि यह एक वर्दीधारी सेवा की मांगों, फिटनेस, तैनाती की क्षमता और कार्यकाल की आवश्यकताओं के बीच एक विधायी संतुलन बनाने का प्रयास था।
यह देखा गया कि 1989 के नियमों ने BSF एयर विंग के मौजूदा पदों, जैसे सीनियर एयरक्राफ्ट मैकेनिक और जूनियर मैकेनिक को, सब-इंस्पेक्टर और असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के लड़ाकू रैंकों में बदल दिया। वेतनमान समान रखे गए। इसलिए ऐसे सभी पद और भविष्य की नियुक्तियाँ लड़ाकू संरचना का हिस्सा बन गईं, जब तक कि उन्हें विशेष रूप से सिविल पदों के रूप में बरकरार न रखा गया हो।
आगे यह भी माना गया कि प्रतिवादी 1996 के नियमों पर भरोसा नहीं कर सकता, क्योंकि वे नियम सेवारत सशस्त्र बल कर्मियों पर लागू होते हैं, जबकि नियुक्ति के समय प्रतिवादी पहले से ही एक पूर्व सैनिक था। उसे सीधे एक लड़ाकू पद पर नियुक्त किया गया, जिसका वेतनमान उच्च था, न कि निचले सिविल वेतनमान पर। इसलिए यदि 1996 के नियम लागू किए जाते हैं तो यह गलत तरीके से उसके पद को सिविल पद के रूप में मानेगा।
इसके अलावा, यह देखा गया कि 1997 के नियम BSF की कॉम्बैटाइज़्ड (लड़ाकू) संरचना से भी संबंधित हैं। उनके प्रावधान केवल सेवारत कर्मियों पर लागू होते हैं, न कि प्रतिवादी पर। साथ ही 1996 के नियम केवल सेवारत सशस्त्र बलों के कर्मियों से संबंधित हैं; वे उन लोगों पर लागू नहीं होते, जो पहले से ही BSF के कॉम्बैटाइज़्ड कैडर में हैं। इसलिए वे 1978 के नियमों को रद्द नहीं कर सकते, जो कमांडेंट से नीचे के रैंक वालों के लिए रिटायरमेंट की उम्र 57 वर्ष निर्धारित करते हैं।
डिवीजन बेंच ने यह पाया कि ट्रिब्यूनल का फैसला इस गलत धारणा पर आधारित था कि वह पद सिविलियन (नागरिक) था और 1996 के नियमों के तहत आता था। ट्रिब्यूनल ने 1989 की उस मंजूरी को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसने पहले ही ऐसे पदों को कॉम्बैटाइज़्ड घोषित कर दिया। यह फैसला दिया गया कि जिस व्यक्ति ने कॉम्बैटाइज़्ड भूमिका के लाभों का आनंद लिया, वह बाद में उसके दायित्वों से इनकार नहीं कर सकता।
डिवीजन बेंच ने यह फैसला दिया कि एयर विंग में एयरक्राफ्ट मैकेनिक के पद 1989 की राष्ट्रपति की मंजूरी द्वारा कॉम्बैटाइज़्ड किए गए। प्रतिवादी की नियुक्ति BSF के कॉम्बैटाइज़्ड अधिकारी के रैंक, वेतन और लाभों के साथ की गई। 1996 के सिविलियन नियम उस पर लागू नहीं होते थे। इसलिए उसका रिटायरमेंट 1978 के नियमों के तहत आता था, यानी उसकी रिटायरमेंट की उम्र 57 वर्ष थी।
उपर्युक्त टिप्पणियों के साथ डिवीजन बेंच ने ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द किया। परिणामस्वरूप, BSF द्वारा दायर रिट याचिकाओं को डिवीजन बेंच ने स्वीकार किया।
Case Name : UOI & Ors. Vs B.N. Chaubey & Ors.