दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सिविल रिट याचिका पर सुनवाई की जा सकती है, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दर्ज प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 17(1) के तहत तलाशी और ज़ब्ती सहित उससे जुड़ी कार्यवाही को चुनौती दी गई हो।

जस्टिस अनीश दयाल ने कहा कि ECIR, ED का आंतरिक प्रशासनिक दस्तावेज़ होने के बावजूद, हाई कोर्ट द्वारा न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।

कोर्ट ने कहा,

"इस कोर्ट को प्रवर्तन निदेशालय द्वारा शुरू की गई ECIR और उससे जुड़ी कार्यवाही - जिसमें PMLA की धारा 17(1) के तहत उठाए गए कदम भी शामिल हैं - को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र है।"

कोर्ट ने तर्क दिया कि चूंकि ECIR एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो किसी 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (मूल अपराध) के होने पर निर्भर करती है, इसलिए जब वह मूल अपराध ही खत्म हो जाता है तो पीड़ित पक्ष ECIR को जारी रखने की कार्यकारी कार्रवाई को चुनौती देने का हकदार होगा।

कोर्ट ने गौर किया कि कई हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं पर सुनवाई की और न्यायिक समीक्षा के सिद्धांतों को लागू करते हुए ECIR या PMLA के तहत की गई अन्य कार्रवाइयों को रद्द किया।

कोर्ट उन याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें PMLA के तहत ED द्वारा की गई ECIR और उसके बाद की कार्रवाई को चुनौती दी गई।

ECIR मूल रूप से दिसंबर 2021 में FIR नंबर 27/2021 (दूसरी FIR) के आधार पर दर्ज की गई थी। यह FIR इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) द्वारा जाली हस्ताक्षर, शेयर ट्रांसफर और बैंक लेनदेन के आरोपों के संबंध में दर्ज की गई।

बाद में EOW ने दिसंबर 2022 में कैंसिलेशन रिपोर्ट (रद्दीकरण रिपोर्ट) दाखिल की। ​​फोरेंसिक जांच में विवादित हस्ताक्षरों को असली पाए जाने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि कोई अपराध नहीं बनता है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 12 जून, 2025 को कैंसिलेशन रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।

हालांकि, 20 अगस्त, 2025 को ED ने ऐडेंडम (पूरक दस्तावेज़) जारी किया, जिसमें मौजूदा ECIR में एक पुरानी FIR (FIR नंबर 279/2019) को भी शामिल किया गया। इस ऐडेंडम के बाद ED ने तलाशी ली और याचिकाकर्ताओं को समन जारी किए। याचिका को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने ECIR से जुड़ी कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस मुख्य अपराध (प्रेडिकेट ऑफ़ेंस) के आधार पर यह मामला शुरू हुआ था, उसे पहले ही बंद किया जा चुका था। कोर्ट ने माना कि ED बाद में किसी पुराने और असंबंधित FIR को ऐडेंडम (पूरक दस्तावेज़) के ज़रिए जोड़कर ECIR को फिर से शुरू नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी न्यायिक आदेश से मुख्य अपराध (प्रेडिकेट ऑफ़ेंस) को फिर से शुरू नहीं किया जाता, तब तक ED ECIR के तहत कार्यवाही जारी नहीं रख सकती, जिसमें दूसरी FIR से जुड़ी जांच भी शामिल है।

कोर्ट ने इसके परिणामस्वरूप की गई ज़बरदस्ती वाली कार्रवाइयों को भी रद्द किया और मामले को पहले जैसी स्थिति (स्टेटस को एंटे) में बहाल करने का निर्देश दिया।

इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चुनौती पर उसके रिट अधिकार क्षेत्र के तहत सुनवाई की जा सकती है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी (निर्णायक प्राधिकरण) के पास वैकल्पिक उपाय के लिए जाने के लिए मजबूर करने की ज़रूरत नहीं है, जैसा कि ED ने तर्क दिया।

कोर्ट ने कहा,

"जब तक यह कोर्ट या कोई ऊपरी कोर्ट मुख्य अपराध (Predicate Offence) की जांच को फिर से शुरू करने का आदेश नहीं देता, तब तक ED उक्त ECIR/DLZO/II/72/2021 के तहत कोई भी कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकती, जिसमें FIR नंबर 27/2021 (दूसरी FIR) से जुड़ी जांच भी शामिल है। उक्त ECIR/DLZO/II/72/2021 से जुड़ी सभी कार्यवाही, जिसमें ज़बरदस्ती की कार्रवाई भी शामिल है, रद्द की जाती हैं। संबंधित याचिकाकर्ताओं के पक्ष में पहले जैसी स्थिति (status quo ante) बहाल की जाए।"

कोर्ट ने माना कि पहली FIR को अतिरिक्त 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (Scheduled Offence) मानकर PMLA कार्यवाही शुरू करने के लिए ECIR में जोड़ा गया 'एडेडम' (Addendum) कानूनी रूप से सही नहीं था।

कोर्ट ने आदेश दिया,

"एडेडम के तहत शुरू की गई सभी कार्यवाही, जिसमें ज़बरदस्ती की कार्रवाई भी शामिल है, रद्द की जाती हैं। संबंधित याचिकाकर्ताओं के पक्ष में पहले जैसी स्थिति बहाल की जाए।"

जस्टिस दयाल ने कहा कि मूल मुख्य अपराध (Predicate Offence) के खत्म हो जाने के बाद एडेडम जारी करके ED असल में एक ऐसी कार्यवाही में "जान डालने" की कोशिश कर रही थी जिसने अपना आधार खो दिया।

यह भी देखा गया कि अगर कानूनी ज़रूरतें पूरी होतीं तो ED पहली FIR के संबंध में स्वतंत्र रूप से ECIR दर्ज कर सकती थी - जो कि अभी भी कायम है। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और इसके कारण उसे ही पता हैं।

कोर्ट ने ED के इस दावे पर भी ध्यान दिया कि उसे पहली FIR के बारे में जुलाई 2025 में पता चला। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि अगस्त 2023 में ED द्वारा ही दाखिल किए गए काउंटर-एफिडेविट (जवाब-हलफनामे) में उस FIR का साफ़ तौर पर ज़िक्र किया गया।

इस प्रकार, कोर्ट ने माना कि ED को अगस्त 2023 से ही उस पिछली FIR के बारे में पता था, लेकिन उसने उस पर तभी भरोसा करने का फैसला किया जब मूल मुख्य FIR में कैंसिलेशन रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) स्वीकार कर ली गई।

Title: KANCHANA RAI v. DIRECTORATE OF ENFORCEMENT NEW DELHI & ORS & other connected matters

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